नई दिल्ली:देश की प्रमुख क्विक-कॉमर्स और फूड डिलीवरी दिग्गज स्विगी (Swiggy) कॉरपोरेट जगत में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव करने जा रही है। कंपनी के शेयरधारकों ने भारी बहुमत से स्विगी को पूरी तरह एक ‘भारतीय स्वामित्व और नियंत्रण वाली कंपनी’ (Indian-Owned and Controlled Company – IOCC) में बदलने के प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी है। इस फैसले के तहत कंपनी अपनी विदेशी शेयरहोल्डिंग को 49.5 प्रतिशत पर सीमित (कैप) कर देगी, जिससे इसे विशुद्ध रूप से भारतीय कंपनी का दर्जा मिल सके।
विदेशी हिस्सेदारी घटने से क्विक-कॉमर्स को मिलेगी नई रफ्तार
बाजार विशेषज्ञों के मुताबिक, स्विगी का यह कदम बेहद सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। भारतीय कॉरपोरेट नियमों के अनुसार, घरेलू स्वामित्व वाली कंपनियों को ई-कॉमर्स और क्विक-कॉमर्स सेक्टर में सीधे ‘इन्वेंट्री मॉडल’ (माल का सीधा स्टॉक रखना और बेचना) पर काम करने की अधिक आजादी मिलती है। विदेशी हिस्सेदारी 49.5% से नीचे आने के बाद स्विगी का क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म ‘इंस्टामार्ट’ सीधे इन्वेंट्री मॉडल का इस्तेमाल कर सकेगा। इससे न सिर्फ कंपनी की ऑपरेशनल लागत कम होगी, बल्कि मुनाफे (प्रॉफिट मार्जिन) में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल सकता है। शेयरधारकों की इस बैठक में इस प्रस्ताव को 93.97 प्रतिशत से अधिक मतों के साथ पारित किया गया।
इधर बड़ा फैसला, उधर ग्राहकों को लगा ‘प्लेटफॉर्म फीस’ का झटका
कॉरपोरेट स्तर पर जहां कंपनी अपनी वित्तीय संरचना को मजबूत कर रही है, वहीं दूसरी ओर आम उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बढ़ गया है। स्विगी ने दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे देश के प्रमुख महानगरों में प्रति ऑर्डर ली जाने वाली ‘प्लेटफॉर्म फीस’ को 20 फीसदी तक बढ़ा दिया है। अब ग्राहकों को हर एक फूड ऑर्डर पर ₹5 की जगह ₹6 की प्लेटफॉर्म फीस चुकानी होगी।
दिलचस्प बात यह है कि स्विगी की मुख्य प्रतिद्वंदी कंपनी जोमैटो (Zomato) ने भी ठीक इसी समय अपनी प्लेटफॉर्म फीस में समान बढ़ोतरी की है। त्योहारों और मानसून के सीजन में मांग बढ़ने का फायदा उठाते हुए दोनों कंपनियों द्वारा एक साथ फीस बढ़ाना इस बात का संकेत है कि अब भारतीय फूड डिलीवरी बाजार पूरी तरह मैच्योर हो चुका है और कंपनियां अब केवल डिस्काउंट देने के बजाय अपने मुनाफे (Profitability) को बढ़ाने पर पूरा ध्यान केंद्रित कर रही हैं।
बाजार और उपभोक्ताओं पर असर
कंज्यूमर फोरम और सोशल मीडिया पर इस ₹1 की बढ़ोतरी को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। हालांकि ₹1 की वृद्धि सुनने में छोटी लगती है, लेकिन रोजाना लाखों ऑर्डर्स प्रोसेस करने वाली इन कंपनियों के लिए यह अतिरिक्त शुल्क उनके राजस्व (Revenue) में करोड़ों रुपये का सीधा इजाफा करता है। आगामी दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पूरी तरह ‘भारतीय’ ब्रांड बनने का यह दांव स्विगी को शेयर बाजार और प्रतिस्पर्धा की इस रेस में जोमैटो के मुकाबले कितनी बढ़त दिला पाता है।
