उत्तराखंड के ऐतिहासिक आदि बद्री मां भगवती शक्तिपीठ में भीषण आग, सदियों पुरानी काष्ठकला और मुख्य मंदिर जलकर खाक
बागेश्वर (उत्तराखंड): देवभूमि उत्तराखंड के बागेश्वर जिले से एक बेहद हृदयविदारक घटना सामने आई है। कपकोट तहसील के दुर्गम और सुदूर हिमालयी क्षेत्र बदियाकोट में स्थित आस्था के प्रमुख केंद्र आदि बद्री मां भगवती मंदिर (शक्तिपीठ) में आज अचानक भीषण आग लग गई। आग इतनी तेजी से फैली कि देखते ही देखते मुख्य मंदिर का पूरा ढांचा जलकर पूरी तरह खाक हो गया।
शारदीय नवरात्रि के पावन समय पर हुई इस भीषण दुर्घटना से पूरा कुमाऊं क्षेत्र स्तब्ध है और स्थानीय निवासियों व श्रद्धालुओं में गहरी मायूसी का माहौल है।
🕒 सुबह लगी आग, लकड़ी का ढांचा होने से फैला विकराल रूप
स्थानीय निवासियों के अनुसार, आग सुबह के समय लगी। मां भगवती का यह मुख्य मंदिर पूरी तरह से देवदार की सूखी लकड़ी और पारंपरिक पहाड़ी वास्तुकला शैली में बना हुआ था। लकड़ी का ढांचा होने के कारण आग ने चंद मिनटों में ही विकराल रूप धारण कर लिया और पूरे गर्भगृह को अपनी चपेट में ले लिया। मंदिर के भीतर रखी मां भगवती की प्राचीन प्रतिमा, पवित्र छत्र और अन्य बहुमूल्य धार्मिक सामग्री भी इस अग्नितांडव की भेंट चढ़ गई है।
दुर्गमता बनी बाधा: 50 किलोमीटर दूर नहीं मिल सकी फायर ब्रिगेड की मदद
यह ऐतिहासिक शक्तिपीठ कपकोट उप-मंडल मुख्यालय से लगभग 50 किलोमीटर दूर अत्यंत दुर्गम पहाड़ी इलाके में स्थित है। इस सुदूर हिमालयी क्षेत्र में अग्निशमन (Fire Station) सेवाओं की कोई तत्काल सुविधा मौजूद नहीं है।
ग्रामीणों ने बताया कि सुबह जब भक्तों ने मंदिर से आग की लपटें उठती देखीं, तो पूरे गांव में हड़कंप मच गया। सुदूर इलाका होने के कारण जब तक प्रशासनिक मदद पहुंचती, मंदिर कई घंटों तक धू-डू कर जलता रहा। ग्रामीणों ने अपने स्तर पर पानी और मिट्टी डालकर आग बुझाने और इसे आसपास के रिहायशी इलाकों में फैलने से रोकने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन मुख्य मंदिर को नहीं बचाया जा सका।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर का बड़ा नुकसान
बदियाकोट का यह मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक और वास्तुकला विरासत का अनूठा प्रतीक था। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह मंदिर करीब 1,500 साल पुराना (5वीं से 8वीं शताब्दी के मध्य का) माना जाता है।
- पारंपरिक काष्ठकला: यह मंदिर अपनी अद्भुत पहाड़ी शैली और लकड़ियों पर की गई बेहद प्राचीन व बारीक नक्काशी (Wood Carvings) के लिए पूरे उत्तराखंड में विख्यात था।
- धार्मिक मान्यता: पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी पावन स्थल पर मां दुर्गा ने महिषासुर के सेनापति दैत्य निशुम्भ का वध किया था। निशुम्भ वध के कारण इस क्षेत्र का नाम पहले ‘वधकोट’ था, जो समय के साथ बदलकर ‘बदियाकोट’ हो गया। यहाँ हर साल नंदा अष्टमी और नवरात्रि में हज़ारों श्रद्धालु मन्नतें लेकर पहुँचते हैं।
आग लगने के कारणों की जांच जारी
शुरुआती तौर पर आशंका जताई जा रही है कि नवरात्रि पूजा के दौरान गर्भगृह में जलाकर छोड़े गए अखंड दीपक की लौ से सूखी लकड़ियों ने आग पकड़ ली, जिसने बाद में विकराल रूप ले लिया। प्रशासन और पुलिस की टीमें मौके पर पहुंचकर नुकसान का सटीक आकलन करने और घटना के सही कारणों का पता लगाने में जुट गई हैं।
इस हादसे के बाद पूरे देवभूमि में शोक की लहर है। क्षेत्रवासियों और श्रद्धालुओं ने सरकार व प्रशासन से इस ऐतिहासिक धरोहर के पुनरुद्धार और भव्य मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए तुरंत कड़े कदम उठाने की मांग की है।
