Thursday, August 27, 2026

TOP NEWS

सुभाष चंद्रा को NCLT...

सुभाष चंद्रा को NCLT से मिली महा-राहत: ₹22,000 करोड़ का कर्ज सिर्फ ₹6.5...

डा. आलोक पुरोहित ने...

*डा. आलोक पुरोहित ने संभाला पण्डित जी फाउंडेशन स्वावलम्बी के राष्ट्रीय सलाहकार का...

इंदौर: रक्षाबंधन पर बहनों...

इंदौर: रक्षाबंधन पर बहनों को सौगात, इंटरसिटी बसों में 48 घंटे मुफ्त सफर...

दिल्ली के तिलक नगर...

दिल्ली के तिलक नगर में सनसनीखेज वारदात, मॉडल युवती की चाकू से गोदकर...
Homeधर्मक्या है 'श्रावणी कर्म' और क्यों सदियों से निभाई जा रही है...

क्या है ‘श्रावणी कर्म’ और क्यों सदियों से निभाई जा रही है यह परंपरा? जानें इसका इतिहास, महत्व और रक्षाबंधन से संबंध

क्या है ‘श्रावणी कर्म’ और क्यों सदियों से निभाई जा रही है यह परंपरा? जानें इसका इतिहास, महत्व और रक्षाबंधन से संबंध

नई दिल्ली/इंदौर: सनातन हिंदू धर्म में सावन मास की पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस पवित्र दिन पर जहाँ बहनें भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं, वहीं सनातन परंपरा में एक बेहद महत्वपूर्ण वैदिक अनुष्ठान किया जाता है, जिसे ‘श्रावणी कर्म’ या ‘उपाकर्म’ कहा जाता है। यह कर्म मुख्य रूप से ब्राह्मणों, ऋषियों और द्विज (जिन्होंने यज्ञोपवीत/जनेऊ धारण किया है) द्वारा किया जाने वाला एक वार्षिक आत्म-शुद्धि का अनुष्ठान है। यह संस्कार सावन पूर्णिमा के दिन नदी के तट या किसी पवित्र जलाशय के किनारे संपन्न किया जाता है। इसके तीन मुख्य भाग होते हैं:

  • हेमाद्रि संकल्प व प्रायश्चित: वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए पापों, वाणी के दोषों और अशुद्धियों से मुक्ति के लिए पंचगव्य (गाय का दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र) और भस्म से स्नान कर प्रायश्चित किया जाता है।
  • ऋषि तर्पण: इस चरण में वेदों के संकलनकर्ता ऋषियों, पितरों और गुरुओं का जल व तिल से तर्पण कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
  • यज्ञोपवीत परिवर्तन: पुराने जनेऊ को उतारकर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ नया ‘यज्ञोपवीत’ (जनेऊ) धारण किया जाता है। इसे द्विजत्व का नया जन्म माना जाता है।

श्रावणी कर्म रक्षाबंधन (सावन पूर्णिमा) के दिन ही क्यों मनाया जाता है?

  • रक्षासूत्र और जनेऊ दोनों ही रक्षा के प्रतीक: रक्षाबंधन का पर्व रक्षा का संकल्प लेने का दिन है। जहाँ बहनें भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर उसकी सुरक्षा की कामना करती हैं, वहीं जनेऊ (यज्ञोपवीत) को भी एक सुरक्षा कवच माना गया है। जनेऊ धारण करने का मतलब है अपने धर्म, ज्ञान और इंद्रियों की रक्षा करने का संकल्प लेना। इसलिए दोनों ही अनुष्ठान एक ही दिन होते हैं।
  • पूर्णिमा की सकारात्मक ऊर्जा: सावन की पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ होता है, जिसे मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इस दिन किए गए ध्यान, जप और शुद्धिकरण के कर्मों का प्रभाव बहुत गहरा होता है।
  • चातुर्मास का विशेष समय: सावन का महीना चातुर्मास के अंतर्गत आता है, जब संत और ऋषि-मुनि यात्राएं बंद करके एक स्थान पर रुकते हैं। आध्यात्मिक साधना और आत्म-मंथन के लिए इस समय को सबसे उत्तम माना गया है, इसीलिए श्रावणी पूर्णिमा को इस बड़े अनुष्ठान के लिए चुना गया।

क्यों किया जाता है यह अनुष्ठान?

  • आत्म-शुद्धि और मानसिक पवित्रता: पूरे वर्ष में मनुष्य से विचार, कर्म या वाणी से कई गलतियाँ होती हैं। श्रावणी कर्म के जरिए व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से खुद को शुद्ध करता है।
  • स्वाध्याय और ज्ञान का संकल्प: यह दिन ज्ञान के अर्जन, वेदों के अध्ययन (स्वाध्याय) और समाज को सही दिशा देने का संकल्प लेने का दिन है।
  • ऋषियों के प्रति सम्मान: हमारे पूर्वज और ऋषि-मुनि जिन्होंने हमें ज्ञान और संस्कृति दी, उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए यह तर्पण किया जाता है।

श्रावणी कर्म का गौरवशाली इतिहास

श्रावणी कर्म का इतिहास वैदिक काल से जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में गुरुकुलों में छात्र इसी दिन से वेदों का अध्ययन शुरू करते थे। सावन पूर्णिमा से लेकर अगले साढ़े पांच महीने तक वेदों का सघन अध्ययन होता था, जिसे ‘उत्सर्जन काल’ तक जारी रखा जाता था।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने ‘हयग्रीव’ (घोड़े के मुख वाले अवतार) के रूप में अवतार लिया था और ब्रह्मा जी से चोरी हुए वेदों को वापस लाकर उन्हें सौंप दिया था। इसलिए इसे ज्ञान की पुनर्स्थापना का दिन भी माना जाता है। श्रावणी पूर्णिमा को इसके ऐतिहासिक और शैक्षिक महत्व के कारण ही भारत सरकार द्वारा ‘विश्व संस्कृत दिवस’ के रूप में भी मनाया जाता है, क्योंकि संस्कृत वेदों और हमारे इतिहास की मूल भाषा है।

समसामयिक संदेश

आज के आधुनिक युग में भले ही गुरुकुल परंपरा कम हो गई हो, लेकिन श्रावणी कर्म का महत्व कम नहीं हुआ है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि इंसान को समय-समय पर अपनी कमियों को सुधारना चाहिए (प्रायश्चित), अपने गौरवशाली इतिहास को याद रखना चाहिए (ऋषि तर्पण) और हमेशा ज्ञान के मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments