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इंद्रधनुष, 5 लाख की भीड़ और आंसू… जानिए 15 अगस्त 1947 को कैसे मनाया गया था आज़ादी का पहला जश्न

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14-15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि…

घड़ी की सूइयों ने जैसे ही 12 बजाए, भारत की किस्मत ने एक नई करवट ली। लगभग दो सदियों की ब्रिटिश गुलामी, अनगिनत कुर्बानियों और लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार आज़ादी का वो सूरज उगा, जिसका इंतजार हर हिंदुस्तानी को था।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि उस दिन देश की सड़कों पर माहौल कैसा था? जब आज़ादी की पहली सुबह हुई, तो लोगों ने इसका जश्न कैसे मनाया था? आइए, इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और चलते हैं 1947 के उस ऐतिहासिक दिन में…


रात के 12 बजे और वो ऐतिहासिक भाषण
14 अगस्त की रात 11:55 बजे दिल्ली का संसद भवन (तत्कालीन संविधान सभा) रोशनी से नहाया हुआ था। पूरे देश की नजरें दिल्ली पर टिकी थीं।
रात के ठीक 12 बजते ही शंखध्वनि और “भारत माता की जय” के नारों से पूरा हॉल गूंज उठा। इसी पल देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपना ऐतिहासिक भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ (Tryst with Destiny) दिया।
“जब आधी रात के वक्त दुनिया सो रही होगी, तब भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा…” — पंडित जवाहरलाल नेहरू
नेहरू जी के इन शब्दों ने करोड़ों भारतीयों की आंखों में आंसू और सीने में एक नया गर्व भर दिया था।


15 अगस्त की सुबह: रायसीना हिल पर उमड़ा जनसैलाब


15 अगस्त की सुबह करीब 8:30 बजे रायसीना हिल (राष्ट्रपति भवन) में लॉर्ड माउंटबेटन ने गवर्नर जनरल और पंडित नेहरू ने भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। कैबिनेट के अन्य मंत्रियों ने भी आज़ाद भारत की सेवा की कसम खाई।
इसके बाद,

शाम को असली जश्न इंडिया गेट (प्रिंस पार्क) के मैदान में देखने को मिला।
5 लाख लोगों की भीड़: वहां करीब 5 लाख से भी ज्यादा लोग जुटे थे।


गायब हो गई परेड की जगह: भीड़ का उत्साह इतना ज्यादा था कि जवानों को परेड करने तक की जगह नहीं मिली। पंडित नेहरू ने लोगों के बीच से होकर राष्ट्रीय ध्वज फहराया।


आसमान में अद्भुत इंद्रधनुष:

जैसे ही तिरंगा फहराया गया और 31 तोपों की सलामी दी गई, ठीक उसी समय आसमान में एक बेहद खूबसूरत इंद्रधनुष दिखाई दिया। लोगों ने इसे आज़ाद भारत के उज्ज्वल भविष्य का कुदरती संकेत माना।


16 अगस्त: लाल किले की प्राचीर से पहला संबोधन
अक्सर लोग मानते हैं कि 15 अगस्त को ही लाल किले पर तिरंगा फहराया गया था, लेकिन लाल किले का ऐतिहासिक कार्यक्रम 16 अगस्त 1947 की सुबह आयोजित हुआ था।16 अगस्त को पंडित नेहरू ने पहली बार लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया और देश को अपना पहला स्वतंत्रता दिवस संदेश दिया। लाल किले के सामने लाखों की संख्या में उमड़ी भीड़ उस पल की गवाह बनी।
एक तरफ जश्न, तो दूसरी तरफ एक गहरी खामोशी
15 अगस्त 1947 का दिन सिर्फ जश्न का ही नहीं, बल्कि एक मिला-जुला अहसास था।

एक तरफ जहां दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और देश के कोने-कोने में लोग दीये जला रहे थे, मिठाइयां बांट रहे थे; वहीं दूसरी तरफ देश के बंटवारे का दर्द भी था। महात्मा गांधी उस दिन दिल्ली के इस जश्न से दूर बंगाल के नोआखली में सांप्रदायिक हिंसा को रोकने और पीड़ितों के आंसू पोंछने में लगे हुए थे।
एक नए युग की शुरुआत
15 अगस्त 1947 का जश्न केवल ब्रिटिश शासन के अंत का उत्सव नहीं था, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के स्वाभिमान, उनकी उम्मीदों और एक नए भारत के निर्माण का संकल्प था। उस दिन फहराया गया तिरंगा आज भी हमें याद दिलाता है कि यह आज़ादी हमें कितनी भारी कीमत पर मिली है।
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