सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) ने देश के तमाम मीडिया घरानों, डिजिटल न्यूज पोर्टल्स और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण और सख्त निर्देश जारी किया है। अदालत ने दो टूक कहा है कि यौन अपराधों की रिपोर्टिंग करते समय मीडिया को अत्यधिक संयम, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता बरतनी चाहिए। सनसनीखेज सुर्खियां और घटना का भड़काऊ विवरण जनहित में नहीं है, बल्कि यह पीड़ित और उसके परिवार को गहरे मानसिक आघात (Secondary Trauma) में धकेल देता है।
यह निर्देश जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने गंभीर मामलों का संज्ञान लेते हुए जारी किया।
सुप्रीम कोर्ट के बड़े निर्देश: जिस पर हर मीडिया संस्थान को अमल करना होगा
अदालत ने मीडिया के काम करने के तरीके और कानूनी जवाबदेही को लेकर कई अहम बिंदु स्पष्ट किए हैं:
1. सनसनीखेज और ग्राफिक विवरण पर पूरी तरह रोक
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि यौन हिंसा की खबरों को ‘सनसनी’ (Sensationalism) बनाकर पेश करना बंद होना चाहिए। घटना का अवांछित विवरण या ग्राफिक डिस्क्रिप्शन देने के बजाय, चर्चा का मुख्य केंद्र न्याय, सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही होना चाहिए।
2. पीड़ित की पहचान छिपाना संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी
कोर्ट ने प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 72 और पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) की धारा 23 के प्रावधानों को सख्ती से याद दिलाया। पीड़ित या नाबालिग बच्चे की पहचान सीधे (Direct) या परोक्ष (Indirect) रूप से किसी भी तरह उजागर नहीं की जा सकती। नाम, पता, स्कूल, या रिश्तेदारों की ऐसी कोई भी जानकारी साझा करना पूरी तरह प्रतिबंधित है जिससे पीड़ित की पहचान हो सके।
3. सुरक्षा और हेल्प डेस्क के लिए प्रो-बोनो (मुफ्त) स्पेस
अदालत ने एक अनूठा और व्यावहारिक निर्देश देते हुए कहा कि जिला प्रशासन को तुरंत स्थानीय मीडिया घरानों के साथ बैठक करनी चाहिए। अखबारों में एक विशेष कॉलम और इलेक्ट्रॉनिक/डिजिटल मीडिया पर निश्चित समय/स्थान तय होना चाहिए। इसमें किसी भी आपातकालीन स्थिति या खतरे के दौरान तुरंत मदद पाने के लिए सुरक्षा उपायों और हेल्पलाइन फोन नंबरों की जानकारी दी जाएगी। मीडिया संस्थान यह सामाजिक जिम्मेदारी बिना किसी शुल्क (Pro Bono) के निभाएंगे।
4. ‘एमिकस क्यूरी’ की नियुक्ति
इस बेहद गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर अदालत की कानूनी सहायता करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता लिज मैथ्यू (Liz Mathew) को ‘एमिकस क्यूरी’ (Amicus Curiae – अदालत का मित्र) नियुक्त किया है।
क्या कहती हैं कानूनी धाराएं?
BNS की धारा 72 (पूर्व में IPC 228A): यौन उत्पीड़न के पीड़ितों का नाम या पहचान छापना/दिखाना पूर्णतः वर्जित है। यह एक गैर-जमानती और दंडनीय अपराध है।
POCSO एक्ट की धारा 23: किसी भी नाबालिग पीड़ित की तस्वीर या पहचान को मीडिया/सोशल मीडिया पर नहीं लाया जा सकता। कानून के तहत कठोर न्यायिक और दत्मक कार्रवाई का प्रावधान है।
एनटीवी टाइम (NTV TIME) की अपील
सुप्रीम कोर्ट के इस दिशा-निर्देश का स्वागत करते हुए NTV TIME अपने सभी पाठकों और सोशल मीडिया यूजर्स से भी अपील करता है कि किसी भी संवेदनशील घटना की खबर को साझा करते समय जिम्मेदारी दिखाएं। सोशल मीडिया पर पीड़ितों की तस्वीरें या नाम फॉरवर्ड करना भी कानूनन अपराध की श्रेणी में आता है। आइए मिलकर एक जागरूक और संवेदनशील समाज का निर्माण करें।
