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Wednesday, August 19, 2026

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श्री तारण तरण स्वामी जी गुरु महाराज की जन्म स्थली पहुचे सिलवानी संघ के साथ बाल ब्रह्मचारी श्री धर्मेंद्र भैया जी



बाल ब्रह्मचारी सत्येंद्र पत्रकार NTV

उपदेश शुद्ध सार ग्रंथादिराज की जय हो
कल हमने धर्म के स्वरूप को समझा
धर्म क्या है।
जो योगी ज्ञानी महापुरुष की मन वचन और काया इन तीनों की एकाग्रता होती है वह योगी धर्म को धारण करते हैं वह धर्म तीनों लोकों में शुद्ध प्रदेशी है ऐसे भव्य जीव शुद्ध धर्म को धारण करते हैं जो चैतन्य स्वरूप अनंत गुण मयी है वह ध्यान अवस्था में उन्हें ग्रहण होता है जिससे सारे कर्म मल क्षय हो जाते हैं वह धर्म कर्मों के क्षय रूप है ऐसे धर्म को जो जीव स्वीकार करते हैं वह चैतन्य से शुद्ध हो जाते हैं
—धर्म मतलब मेरी आत्मा का चैतन्य स्वभाव, मेरी आत्मा का स्वभाव ही धर्म है शुद्ध चैतन्य सत्ता ही धर्म है बाहर में जो भी पर्याय है रागादि भाव है वह मुझ में नहीं है मेरे नहीं है मेरा उनसे कोई संबंध नहीं है क्योंकि वह अशुद्ध चैतन्य की पर्याय में घटें या  शुद्ध चैतन्य की पर्याय में घटें इन दोनों ही पर्याय से मेरा कोई संबंध नहीं मैं उत्पाद व्यय से रहित ध्रुव सत्ता हूं
रागादिभाव जिस भूमि में होते हैं वह भूमि ही मेरी नहीं है इसके लिए अपना ध्रुव स्वभाव का निश्चय पक्का होना चाहिए जैसे बेटी जब जन्म लेती है तो उस समय से ही हमारे अंदर यह मान्यता बैठी रहती है कि यह पराई है भले ही हम उसे पालते पोषते हैं बड़ा करते हैं उसकी शादी करते हैं पर अंदर में यही रहता है कि यह पराई है इसी तरह जो रागादि पर्याय हैं वह सब पर्याय हैं यद्यपि वह मेरी आत्मा से ही निकलती हैं।
—जब निश्चय पक्का होता है तो अंदर से ऐसा आता है कि यह है ही नहीं मतलब मेरे स्वभाव में कुछ भी नहीं है कोई प्रवेश ही नहीं कर सकता मैं अनंत चतुष्टय का धारी ध्रुव तत्व शुद्ध आत्मा हूं
–बार-बार हम अंदर से ऐसा कहें और अगर एक बार भी हमें अपने ध्रुव का बहुमान आ गया तो हमें ध्रुव का सपोर्ट मिलेगा और उस पर मोहर लगेगी।
—हमें किसी का सपोर्ट मिलता है तो हमारे अंदर की शक्ति बढ़ जाती है  तो हमारे अंदर भी अनंत शक्तियां हैं वह प्रकट होंगी
–अहो धन्यहै धन्य है धन्य है शुद्ध जिन देशना धन्य है धर्म का स्वरूप धन्य है ऐसी धर्म का स्वरूप बताने वाले भैया जी की अनंत अनंत अनुमोदना है अनुमोदना है अनुमोदना है जय हो जय हो जय हो शुद्ध जिन देशना  की जय हो जय हो जय हो ध्रुव त्रिकाली परमात्मा की जय हो जय हो जय हो

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