‘पसंदीदा पत्रकारिता’ के शौकीन अभिजीत दीपके और नेहा बोरा: तीखे सवालों पर घिरे, तो लोकतंत्र का राग भूलकर दिखाने लगे हेकड़ी
विशेष रिपोर्ट (नई दिल्ली): खुद को वैकल्पिक राजनीति का चेहरा और “लोकतंत्र का रक्षक” बताने वाले युवा नेताओं की असल परीक्षा तब होती है, जब उनके सामने उनकी विचारधारा से अलग और असहज करने वाले सवाल पूछे जाएं। गुरुवार को दिल्ली के प्रेस क्लब में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके और AISA प्रमुख नेहा बोरा की संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस ने यह साफ कर दिया कि ये नेता भी उसी ‘सिलेक्टिव टॉलरेंस’ (चुनिंदा सहिष्णुता) के शिकार हैं, जिसका आरोप ये अक्सर दूसरों पर लगाते हैं।
मंच से लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले ये चेहरे तब पूरी तरह बेनकाब हो गए, जब स्वतंत्र पत्रकारिता का स्वागत करने के बजाय इन्होंने अपनी पसंद के इतर सवाल पूछने वाले मीडियाकर्मियों को धक्के मारकर बाहर निकालने की वकालत कर दी।
जब ‘बांग्लादेश मॉडल’ पर पूछा सवाल, तो गायब हो गई वैचारिक सहिष्णुता
प्रेस कॉन्फ्रेंस मुख्य रूप से चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) और CJP नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में बुलाई गई थी। लेकिन जब मुख्यधारा के मीडिया (रिपब्लिक टीवी) के पत्रकारों ने नेहा बोरा से उनके पुराने और विवादित बयानों को लेकर तीखा सवाल दाग दिया—जिसमें ‘बांग्लादेश के आंदोलन से प्रेरणा लेने’ की बात कही गई थी—तो मंच पर मौजूद नेताओं के चेहरे का रंग उड़ गया।
एक राजनेता या छात्र नेता से उम्मीद की जाती है कि वह ऐसे तीखे सवालों का तार्किक, स्पष्ट और ठोस जवाब दे। लेकिन यहाँ जवाब देने के बजाय विक्टिम कार्ड (Victim Card) खेला जाने लगा। सवाल पूछने के तरीके को ‘अराजकता’ का नाम देकर पूरे विमर्श को ही मोड़ने की कोशिश की गई।
“सिर्फ अपनी पसंद की रिपोर्टिंग चाहिए” – नेताओं का दोहरा रवैया
इस पूरे घटनाक्रम ने इन युवा नेताओं की उस दोगली मानसिकता को उजागर कर दिया है, जहाँ उन्हें सिर्फ ऐसी मीडिया और रिपोर्टर पसंद हैं जो उनसे उनकी पसंद के सवाल पूछें या उनकी हां में हां मिलाएं।
एक तरफ नेहा बोरा इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में द कारवां और द क्विंट जैसी अपनी पसंदीदा मीडिया के पत्रकारों पर पुलिस कार्रवाई का विरोध कर रही थीं और प्रेस की आजादी का रोना रो रही थीं। लेकिन जैसे ही उनके सामने एक ऐसी मीडिया (रिपब्लिक भारत) आई जो उनसे असहज करने वाले सवाल पूछ रही थी, तो उन्होंने तुरंत उसे ‘गोदी मीडिया’ या ‘बाधित करने वाले’ का टैग देकर बाहर निकलवाने की मांग कर दी। यानी जब तक पत्रकार इनके सुर में सुर मिलाए, तब तक वह लोकतंत्र का रक्षक है, और जैसे ही वह विपरीत सवाल पूछ ले, तो उसका बहिष्कार कर दिया जाता है।
“50-100 रुपये दो और बाहर निकालो” – अहंकार की पराकाष्ठा
सवालों से बचने और खुद को घिरता देख अभिजीत दीपके ने जो किया, वह उनके तथाकथित “जमीनी और विनम्र नेता” होने के दावों की धज्जियां उड़ा देता है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से माइक पर चिल्लाते हुए कहा:
“जिसके लिए वो आए हैं, प्रेस क्लब से ₹50 का नोट देकर इनको बाहर कर दीजिए… ₹100 के लिए ऐसी हरकतें करते हैं।”
यह बयान सीधे तौर पर यह दिखाता है कि इन नेताओं के मन में उन पत्रकारों के प्रति कितना अहंकार और हिकारत भरी है जो इनके एजेंडे के अनुसार काम नहीं करते। किसी पत्रकार को “50-100 रुपये के लिए बिकने वाला” कहना यह साबित करता है कि यह पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस केवल अपनी बात थोपने के लिए थी, न कि किसी लोकतांत्रिक संवाद के लिए।
जब खुद पर आई, तो ‘कैमरा रोल’ से भागे दीपके
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे कुछ हालिया घटनाक्रमों और वीडियो क्लिप्स से भी यह साफ हुआ है कि अभिजीत दीपके जैसे नेता जब भी विपक्ष या अपने बयानों पर सीधे क्रॉस-क्वेश्चनिंग का सामना करते हैं, तो वे पूरी तरह से असहज हो जाते हैं। कुछ मौकों पर तो वे लाइव कैमरा फ्रेम छोड़कर भी भाग खड़े हुए हैं।
साफ है कि इन नए दौर के नेताओं को भी मीडिया से सिर्फ ‘वाहवाही’ और अपनी शर्तों पर कवरेज चाहिए। जब तक आप इनके नैरेटिव के हिसाब से चलेंगे, आप पत्रकार हैं, वरना आपको “₹50 देकर बाहर निकालने” लायक समझा जाता है।
