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राम के नाम पर चंदा, लेकिन राम के प्रचार में कंजूसी क्यों? — महंत मनोज शर्मा ‘मनु जी महाराज’

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राम के नाम पर चंदा, लेकिन राम के प्रचार में कंजूसी क्यों? — महंत मनोज शर्मा ‘मनु जी महाराज’

रामलीलाओं में भगवान श्रीराम के आदर्शों, माता सीता के जन्मोत्सव और माता शबरी के प्रसंगों को भी मिले समान महत्व: महंत मनोज शर्मा

चंडीगढ़: महंत मनोज शर्मा ‘मनु जी महाराज’ ने रामलीलाओं के आयोजन और दशहरा उत्सव की परंपराओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि भगवान श्रीराम के नाम पर चंदा इकट्ठा किया जाता है, लेकिन रामलीला के प्रचार-प्रसार में भगवान श्रीराम के आदर्शों को उतना महत्व क्यों नहीं दिया जाता, जितना रावण और उसके परिवार के पात्रों को मिलता है? उन्होंने आयोजकों से आत्ममंथन करने की अपील की।
महंत मनोज शर्मा ने कहा कि रामलीला का उद्देश्य केवल मंचन और मनोरंजन तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके माध्यम से आने वाली पीढ़ियों को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन, त्याग, सत्य, धर्म, कर्तव्य और आदर्शों की शिक्षा भी दी जानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि रामलीला शुरू होने से पहले ही घरों, दफ्तरों, स्कूलों, बाजारों और समाचार पत्रों में रावण के पुतलों तथा रावण से जुड़े प्रचार को प्रमुखता मिलने लगती है, जबकि भगवान श्रीराम के जीवन और उनके आदर्शों के प्रचार पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है।
उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव और माता सीता के जन्मोत्सव जैसे प्रसंगों को भी विशेष धार्मिक उत्साह के साथ मनाया जाना चाहिए। इन अवसरों पर प्रसाद वितरण, लंगर और अन्य धार्मिक सेवा कार्यक्रम आयोजित करने की परंपरा को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इसी प्रकार, भगवान श्रीराम की बारात के आयोजन में भी श्रद्धा, उत्साह और धार्मिक संदेश को प्रमुखता मिलनी चाहिए।
महंत मनोज शर्मा ने माता शबरी के प्रसंग का उल्लेख करते हुए सवाल किया कि जब रामलीला में माता शबरी द्वारा भगवान श्रीराम को प्रेमपूर्वक बेर अर्पित करने का दृश्य प्रस्तुत किया जाता है, तो उस दिन श्रद्धालुओं के बीच फल वितरण जैसे कार्यक्रम क्यों नहीं किए जाते? उन्होंने कहा कि माता शबरी का प्रसंग प्रेम, भक्ति, समर्पण और सामाजिक समरसता का संदेश देता है। ऐसे प्रसंगों को केवल मंच पर दिखाने के बजाय उनके मूल संदेश को समाज तक पहुंचाना भी जरूरी है।
उन्होंने दशहरा उत्सव की एक प्रचलित व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि कई स्थानों पर रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों के दहन के लिए बोली लगाने अथवा अधिक राशि देने वाले व्यक्ति को पुतले में आग लगाने का अवसर देने की परंपरा देखने को मिलती है। उन्होंने पूछा कि क्या दशहरे का मूल उद्देश्य केवल पुतलों का दहन और उससे जुड़ी आर्थिक गतिविधियां रह जाना चाहिए, या फिर इस पर्व के माध्यम से बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश भी समाज तक पहुंचना चाहिए?
महंत मनोज शर्मा ने कहा कि रामलीला के आयोजकों, धार्मिक संस्थाओं और समाज के जिम्मेदार लोगों को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि हम आने वाली पीढ़ियों को भगवान श्रीराम के आदर्शों के बजाय केवल रावण के पात्र, उसके परिवार और पुतलों के आकर्षण तक सीमित जानकारी देंगे, तो रामलीला के मूल धार्मिक और नैतिक उद्देश्य को पूरा करना कठिन हो जाएगा।
उन्होंने अपील की कि रामलीलाओं में भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण, भरत, हनुमान जी और माता शबरी के जीवन प्रसंगों को अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया जाए। साथ ही, राम जन्मोत्सव, सीता जन्मोत्सव, राम बारात और अन्य धार्मिक प्रसंगों के अवसर पर सेवा, प्रसाद वितरण तथा जनकल्याण के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएं।
अंत में महंत मनोज शर्मा ‘मनु जी महाराज’ ने कहा कि “रामलीला केवल रावण का पुतला जलाने का आयोजन नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संदेश है। हमें यह सोचना होगा कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को राम का आदर्श दे रहे हैं या केवल रावण के प्रचार तक सीमित रह गए हैं। राम के नाम पर चंदा इकट्ठा होता है, तो राम के प्रचार और उनके आदर्शों के प्रसार में भी समान उत्साह दिखाई देना चाहिए।”

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