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CRIMEX:दिल्ली का वो खौफनाक तंदूर कांड: जानिए क्यों और कैसे सुशील शर्मा ने अपनी ही पत्नी को जिंदा भट्टी में झोंक दिया, रूह कंपा देगी पूरी इनसाइड स्टोरी

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“लिव-इन पार्टनरशिप से शादी तक का सफर, फिर शक की वो खौफनाक रात; जानिए कैसे एक मुस्तैद कांस्टेबल की नजर ने खोल दिया था राजनीति और कत्ल के इस सबसे बड़े गठजोड़ का राज।”

दिल्ली का वो खौफनाक तंदूर कांड: सियासत, जानलेवा शक और वो आधी रात जब दहल उठा था पूरा देश

भारत के आपराधिक इतिहास में साल 1995 की वो रात एक ऐसा काला पन्ना बनकर दर्ज हुई जिसकी खौफनाक दास्तान आज भी लोगों की रूह कंपा देती है। दिल्ली के सबसे व्यस्त और पॉश इलाके कनॉट प्लेस में राजनीतिक रसूख, जानलेवा शक और एक क्रूर हत्याकांड की ऐसी पटकथा लिखी गई जिसे आज भी दुनिया ‘तंदूर कांड’ के नाम से जानती है। यह पूरी कहानी दिल्ली यूथ कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सुशील शर्मा और उनकी पत्नी नैना साहनी के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ आपसी अविश्वास की आग ने एक हंसती-खेती जिंदगी को सचमुच तंदूर की भट्टी में झोंक दिया।

शक की वो चिंगारी जिसने ली नैना की जान

इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत सुशील शर्मा के मन में पनप रहे गहरे शक से हुई थी। नैना साहनी एक कमर्शियल पायलट थीं और कांग्रेस पार्टी की सक्रिय कार्यकर्ता भी थीं। दोनों ने समाज और परिवार से छिपकर प्रेम विवाह किया था और दिल्ली के मंदिर मार्ग स्थित एक फ्लैट में साथ रह रहे थे। सुशील स्वभाव से बेहद शक्की और पजेसिव था। उसे लगातार यह अंदेशा रहता था कि नैना का अपने एक पुराने कॉलेज मित्र मतलूब करीम के साथ प्रेम संबंध चल रहा है। इसी बात को लेकर दोनों के बीच अक्सर गहरे विवाद होते रहते थे।

2 जुलाई 1995 की उस मनहूस रात को जब सुशील अपने फ्लैट पर पहुंचा, तो उसने देखा कि नैना फोन पर किसी से बात कर रही थी और उसके सामने शराब का ग्लास रखा था। सुशील को अचानक सामने देखकर नैना घबरे गई और उसने तुरंत फोन काट दिया। सुशील का शक यकीन में बदल गया और उसने तुरंत उसी नंबर पर वापस कॉल मिलाया। दूसरी तरफ से मतलूब करीम की आवाज सुनाई दी। यह सुनते ही सुशील के सिर पर खून सवार हो गया। दोनों के बीच बेहद तीखी बहस शुरू हो गई। गुस्से और पागलपन में आकर सुशील ने अपनी जेब से लाइसेंसी रिवॉल्वर निकाली और नैना पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं। दो गोलियां नैना के सिर और गर्दन में लगीं और वह वहीं फर्श पर गिर गई। कुछ ही मिनटों में नैना की सांसें थम गईं और वह फ्लैट एक मर्डर सीन में तब्दील हो चुका था।

लाश को ठिकाने लगाने की साजिश और ‘बगिया रेस्टोरेंट’

हत्या करने के बाद सुशील के सामने सबसे बड़ी चुनौती लाश को ठिकाने लगाने की थी ताकि वह कानून की नजरों से बच सके। उसने लाश को एक बड़े प्लास्टिक में लपेटा और उसे अपनी मारुति कार की डिग्गी में डाल दिया। वह सीधे कनॉट प्लेस के अशोक यात्री निवास स्थित ‘बगिया रेस्टोरेंट’ पहुंचा, जिसका संचालन उसका करीबी दोस्त केशव कुमार करता था। रात के करीब 11 बज रहे थे और रेस्टोरेंट बंद होने की कगार पर था। सुशील ने केशव को पूरी बात बताई और दोनों ने मिलकर सबूत मिटाने की साजिश रची। शव को पूरी तरह नष्ट करने के लिए उन्होंने रेस्टोरेंट के खुले अहाते में बने तंदूर (मिट्टी के ओवन) को सुलगवाया। दोनों ने नैना के शव को तंदूर के भीतर धकेल दिया। लाश जल्दी और पूरी तरह से जल जाए, इसके लिए उन्होंने किचन से भारी मात्रा में मख्‍खन और घी लाकर तंदूर में डालना शुरू कर दिया, जिससे आग की लपटें तेजी से उठने लगीं।

जांबाज कांस्टेबल की वो मुस्तैदी जिसने राज खोला

ठीक उसी समय दिल्ली पुलिस की एक पीसीआर वैन और इलाके के कांस्टेबल अब्दुल नजीर कय्यूम अपनी नियमित रात की गश्त पर थे। तभी कांस्टेबल अब्दुल की नजर रेस्टोरेंट की छत से उठते हुए गहरे काले धुएं पर पड़ी। हवा में किसी चीज के जलने की बेहद अजीब और असहनीय दुर्गंध फैली हुई थी। शक होने पर कांस्टेबल तुरंत रेस्टोरेंट की दीवार लांघकर अंदर पहुंचे। वहां उन्होंने मैनेजर केशव को तंदूर में घी डालते हुए देखा। पुलिस को देखकर केशव घबरा गया और उसने बहाना बनाया कि वह पार्टी के पुराने बैनर और पोस्टर जला रहा है। लेकिन जब कांस्टेबल ने अपने डंडे से तंदूर के अंदर टटोला, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। तंदूर के भीतर एक महिला का आधा जला हुआ धड़ और पिघलती हड्डियां साफ दिखाई दे रही थीं। पुलिस को कार्रवाई करते देख सुशील शर्मा वहां खड़ी अपनी कार में बैठकर रात के अंधेरे में फरार हो गया। पुलिस ने तुरंत केशव को हिरासत में लिया और शव को कब्जे में ले लिया।

दिल्ली पुलिस की वो ऐतिहासिक फॉरेंसिक तफ्तीश

इसके बाद शुरू हुई दिल्ली पुलिस की वो ऐतिहासिक और वैज्ञानिक तफ्तीश जिसने इस हाई-प्रोफाइल केस की तकदीर बदल दी। चूंकि आरोपी एक बहुत बड़ा राजनीतिक चेहरा था, इसलिए पुलिस पर चौतरफा दबाव था। शव इतनी बुरी तरह जल चुका था कि उसकी शिनाख्त करना नामुमकिन था। अदालत में आरोपी यह दावा कर सकता था कि यह लाश नैना की है ही नहीं। इस चुनौती से निपटने के लिए दिल्ली पुलिस ने भारत के कानूनी इतिहास में पहली बार ‘डीएनए फिंगरप्रिंटिंग’ (DNA Fingerprinting) तकनीक का सहारा लिया। पुलिस ने नैना साहनी के माता-पिता के खून के नमूने लिए और हैदराबाद की सीसीएमबी लैब में शव के अवशेषों के साथ उनका मिलान कराया। रिपोर्ट पॉजिटिव आई, जिसने वैज्ञानिक रूप से यह साबित कर दिया कि वह शव नैना साहनी का ही था।

पुलिस तफ्तीश का दूसरा सबसे बड़ा हथियार बैलिस्टिक जांच बनी। पहली पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डॉक्टरों ने मौत की वजह सिर्फ जलना लिख दिया था, जिससे केस कमजोर हो रहा था। पुलिस ने हार नहीं मानी और डॉक्टरों के एक विशेष पैनल से शव का दोबारा पोस्टमार्टम कराया। इस दूसरी ऑटोप्सी में साफ हुआ कि तंदूर में डालने से पहले नैना को गोलियां मारी गई थीं। पुलिस ने सुशील के फ्लैट की गहन तलाशी ली, जहाँ से उन्हें खून के धब्बे और गोलियों के खोखे मिले। फॉरेंसिक लैब ने यह प्रमाणित कर दिया कि नैना के शरीर से निकली गोलियां सुशील की ही लाइसेंसी रिवॉल्वर से चली थीं। इन पुख्ता वैज्ञानिक सबूतों ने सुशील के बचने के सारे रास्ते बंद कर दिए।

फरारी, सरेंडर और अदालत का आखिरी फैसला

इस बीच सुशील शर्मा लगातार पुलिस को छका रहा था। वह दिल्ली से जयपुर, फिर मुंबई, चेन्नई होते हुए बेंगलुरु भाग गया। वह अपने वकीलों के जरिए अग्रिम जमानत की कोशिश में था, लेकिन दिल्ली पुलिस की स्पेशल टीमों ने देश भर में जाल बिछा दिया था। हर तरफ मीडिया और अखबारों में यह खबर छाई हुई थी। चारों तरफ से घिर जाने के बाद, घटना के ठीक आठ दिन बाद यानी 10 जुलाई 1995 को सुशील शर्मा ने बेंगलुरु के एक थाने में आत्मसमर्पण कर दिया। दिल्ली पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर वापस दिल्ली लेकर आई।

यह मामला अदालत में सालों तक चला। साल 2003 में निचली अदालत ने इसे “दुर्लभ से दुर्लभतम” (Rare of Rare) मामला मानते हुए सुशील शर्मा को फांसी की सजा सुनाई। साल 2007 में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को सही ठहराया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। अक्टूबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि यह हत्याकांड किसी समाज के खिलाफ अपराध नहीं था, बल्कि एक पति द्वारा अपनी पत्नी पर किए गए जानलेवा शक का नतीजा था। कोर्ट ने सुशील का कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड न होने और जेल में उसके सुधरने की संभावना को देखते हुए फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। तिहाड़ जेल में 23 साल से अधिक का समय बिताने और अच्छे आचरण के कारण, आखिरकार दिसंबर 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर सुशील शर्मा को जेल से स्थाई रूप से रिहा कर दिया गया। यह केस आज भी भारतीय पुलिस की सूझबूझ और फॉरेंसिक साइंस की ताकत की सबसे बड़ी मिसाल माना जाता है।

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