बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में चुनाव आयोग की नीतियों के खिलाफ आयोजित एक बड़े विरोध प्रदर्शन में मशहूर यूट्यूबर ध्रुव राठी ने हिस्सा लिया। भारत में किसी सार्वजनिक प्रदर्शन के मंच पर पहली बार उतरे ध्रुव राठी ने बेहद आक्रामक अंदाज में “वोट चोर, गद्दी छोड़” के नारे लगाए और देश की चुनावी व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर आरोप मढ़े। लेकिन इस ताजा नारेबाजी और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उठाए जा रहे तीखे सवालों के बीच एक बुनियादी और सबसे न्यायसंगत सवाल खड़ा होता है—सड़कों पर उतरकर दूसरों को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वाले ध्रुव राठी का अपना खुद का वोट कहाँ है?
बेंगलुरु के मंच से नारों की गूंज और जमीनी हकीकत का विरोधाभास
इस प्रदर्शन के दौरान ध्रुव राठी ने मंच से वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे तक की मांग कर डाली। लोकतंत्र और जनता के अधिकारों की रक्षा के नाम पर दिए गए उनके इस पहले सार्वजनिक भाषण की काफी चर्चा हो रही है। लेकिन जब हम ध्रुव राठी के खुद के नागरिक कर्तव्यों और चुनावी रिकॉर्ड को देखते हैं, तो एक बड़ा विरोधाभास सामने आता है।
तथ्य यह है कि साल 2014 में उच्च शिक्षा के लिए जर्मनी जाने के बाद से लेकर अब तक (चाहे वह 2019 का चुनाव हो या 2024 का), ध्रुव राठी ने भारत के किसी भी आम चुनाव में खुद अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं किया है।
विदेशी धरती से उपदेश, पर कर्तव्य से दूरी?
भारत के चुनावी नियमों के अनुसार, किसी भी प्रवासी भारतीय (NRI) को मतदान करने के लिए अपने निर्धारित पोलिंग बूथ पर शारीरिक रूप से उपस्थित होना अनिवार्य होता है। चूंकि भारत में एनआरआई नागरिकों के लिए ऑनलाइन वोटिंग या डाक द्वारा मतदान की व्यवस्था नहीं है, इसलिए जर्मनी में रहने वाले ध्रुव राठी चुनाव के दिनों में कभी वोट डालने भारत नहीं आए।
यहाँ मुख्य सवाल यह उठता है कि:
- क्या सिर्फ इंटरनेट पर वीडियो बनाकर या आज बेंगलुरु के मंच पर खड़े होकर देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को ‘चोर’ कह देना काफी है?
- क्या एक सजग नागरिक का पहला कर्तव्य यह नहीं होना चाहिए कि वह विपरीत परिस्थितियों में भी अपने देश आए और पोलिंग बूथ पर जाकर अपनी उंगली पर स्याही लगवाए?
- जब आप खुद देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने के लिए एक हवाई टिकट तक नहीं ले सकते, तो उसी व्यवस्था पर इस तरह के तीखे हमले करने का नैतिक अधिकार कितना सही है?
अधिकार बनाम जिम्मेदारी
निश्चित रूप से, एक भारतीय नागरिक होने के नाते हर व्यक्ति को देश की व्यवस्था पर सवाल उठाने का पूरा हक है। लेकिन लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं, बल्कि व्यक्तिगत जिम्मेदारियों से भी चलता है। ध्रुव राठी अक्सर अपने वीडियो में देश के युवाओं से भारी संख्या में मतदान करने की अपील करते हैं। ऐसे में खुद चुनावों से नदारद रहने के बाद आज बेंगलुरु में आकर “वोट चोरी” का नारा बुलंद करना यह दिखाता है कि डिजिटल स्पेस या रैलियों में लोकतंत्र की बातें करना जितना आसान है, धरातल पर आकर खुद अपनी नागरिक जिम्मेदारी निभाना उतना ही कठिन।
बेंगलुरु के मंच से “वोट चोर” के नारे लगाना सुर्खियां तो बटोर सकता है, लेकिन यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि जो व्यक्ति खुद को भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा पैरोकार बताता है, उसका अपना वोट पिछले 12 सालों से गायब क्यों है? व्यवस्था में सुधार की मांग वही सबसे मजबूत लगती है, जो खुद उस व्यवस्था में सक्रिय भागीदारी निभाकर की जाए।
