इंदौर: सरकारी डेंटल कॉलेज में जंग लगे औजारों से इलाज, 500 से अधिक मरीजों की जान जोखिम में
- इंदौर के एकमात्र शासकीय ऑटोनोमस डेंटल कॉलेज की ओपीडी में रोजाना आते हैं 450 से 500 मरीज।
- दांतों की सर्जरी और स्केलिंग के लिए पुराने व जंग लगे उपकरणों का इस्तेमाल करने का गंभीर आरोप।
- अस्पताल में बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी, 500 मरीजों के लिए बैठने की व्यवस्था केवल 100 कुर्सियों की।
- मरीजों में हेपेटाइटिस, एचआईवी और खतरनाक बैक्टीरियल इंफेक्शन फैलने का बढ़ा बड़ा खतरा।
इंदौर। मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर से स्वास्थ्य विभाग और शासकीय स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को शर्मसार करने वाला एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। इंदौर के एकमात्र शासकीय ऑटोनोमस डेंटल कॉलेज में इलाज के नाम पर मरीजों के स्वास्थ्य और उनकी जिंदगी के साथ सरेआम खिलवाड़ किया जा रहा है।
अस्पताल में दांतों के संवेदनशील इलाज, जैसे सर्जरी और स्केलिंग (सफाई) के लिए जंग लगे और पुराने औजारों का धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जा रहा है। डॉक्टरों की यह लापरवाही मरीजों को ठीक करने के बजाय उन्हें गंभीर और जानलेवा बीमारियों की ओर धकेल रही है।
रोजाना 500 मरीजों की ओपीडी, संक्रमण का बड़ा खतरा
शासकीय डेंटल कॉलेज इंदौर का एक प्रमुख केंद्र है, जहाँ शहर के साथ-साथ आसपास के ग्रामीण इलाकों से भी रोजाना 450 से 500 मरीज दांतों की गंभीर समस्याओं का इलाज कराने पहुँचते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, डेंटल ट्रीटमेंट के दौरान सीधे खून और मसूड़ों के संपर्क में आने वाले औजारों का 100% स्टेरलाइज (संक्रमण मुक्त) होना अनिवार्य है।
यदि औजार पुराने हैं या उन पर जंग लगी है, तो मरीजों में हेपेटाइटिस (Hepatitis B & C), एचआईवी (HIV) और खतरनाक बैक्टीरियल इंफेक्शन फैलने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। गरीब और मध्यम वर्ग के मरीज निजी क्लीनिकों का भारी खर्च उठाने में असमर्थ होने के कारण यहाँ आते हैं, लेकिन सरकारी अव्यवस्था का शिकार बन रहे हैं।
अस्पताल में सुविधाओं का अकाल: खड़े-खड़े बीत रहे कई घंटे
कॉलेज में सिर्फ औजारों की ही समस्या नहीं है, बल्कि बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर की भी स्थिति बदहाल है। अस्पताल की ओपीडी में रोजाना 500 मरीज आते हैं, लेकिन वेटिंग एरिया में सिर्फ 100 मरीजों के बैठने की जगह है। बाकी मरीजों को घंटों खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है।
इसके साथ ही अस्पताल में डायग्नोस्टिक सेवाएं भी पूरी तरह चरमरा गई हैं। अस्पताल में एक्स-रे मशीनें अक्सर खराब रहती हैं। मशीनों के प्रिंटर काम न करने की वजह से रिपोर्ट मिलने में भारी देरी होती है, जिससे मरीजों की लंबी लाइनें लग जाती हैं। वहीं दूसरी ओर सुरक्षाकर्मियों की भारी कमी के कारण परिसर में आए दिन हंगामे और विवाद की स्थिति निर्मित होती है।
प्रशासन का तर्क: बजट की कमी, 2027 तक सुधार का दावा
इस पूरे मामले में जब अस्पताल प्रबंधन और डॉक्टरों का पक्ष जाना गया, तो उनका कहना है कि मरीजों की संख्या के अनुपात में कॉलेज को मिलने वाला बजट और संसाधन बेहद कम हैं। अत्यधिक वर्कलोड के कारण मशीनें और उपकरण जल्दी खराब हो रहे हैं।
हालांकि, कॉलेज प्रशासन ने अपनी सफाई में यह भी कहा है कि अस्पताल के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह सुधारने और नई आधुनिक सुविधाएं विकसित करने के लिए मार्च 2027 तक का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद ही मरीजों को इन सभी अव्यवस्थाओं और पुरानी मशीनों से पूरी तरह निजात मिल पाएगी।
शासकीय अस्पताल की इस लापरवाही को लेकर स्थानीय नागरिकों और मरीजों के परिजनों में भारी आक्रोश है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्रशासन मार्च 2027 के वादे कर के वर्तमान में मरीजों को मौत के मुंह में नहीं धकेल सकता। जंग लगे औजारों के इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगनी चाहिए और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।



