इंदौर। देश के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर की चमकती सड़कों पर बीते दो-तीन दिनों से गंदगी और कचरे का अंबार नजर आने लगा है। नगर निगम के सफाई कर्मचारियों की जारी हड़ताल के कारण नेहरू नगर, पाटनीपुरा और कई मुख्य बाजारों में कचरा पेटी लबालब भर चुकी हैं और कचरा सड़कों पर फैल रहा है। इस जमीनी संकट ने शहर के नीति-निर्धारकों के सामने एक बहुत बड़ा और कड़वा सवाल खड़ा कर दिया है: क्या मंच पर चमचमाती ट्राफियां और अवार्ड लेने वाले प्रशासनिक हाथों से शहर साफ रह सकता है? या फिर असल हकदार वे सफाई मित्र हैं जिनके हाथ काम बंद कर दें, तो 48 घंटों में ही नंबर-1 का ताज हिल जाता है?
हड़ताल ने दिखाई ‘नंबर वन’ की असली हकीकत
इंदौर नगर निगम के सफाई कर्मचारी अपनी पुरानी मांगों—जैसे नियमितीकरण (परमानेंट करना), समान काम-समान वेतन और ठेका प्रथा बंद करने को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। जब तक वे रोज सुबह 4 बजे सड़कों पर झाड़ू लगाते थे, तब तक प्रशासनिक अमला और जन प्रतिनिधि दिल्ली के बड़े मंचों पर जाकर पुरस्कारों की वाहवाही लूटते रहे।
लेकिन जैसे ही इन पसीना बहाने वाले हाथों ने अपना काम रोका, इंदौर की पूरी सफाई व्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह गई। जनता अब सोशल मीडिया और सड़कों पर खुलकर कह रही है कि असली इंदौर को साफ रखने वाले हाथ और सिर्फ अवार्ड के मंच पर फोटो खिंचवाने वाले हाथों में जमीन-आसमान का अंतर है। अवार्ड लेने वाले हाथ कभी खुद सड़क पर कचरा नहीं उठा सकते।
पसीना बहाने वाले हाथों को मंच पर सम्मान क्यों नहीं?
स्थानीय रहवासियों और प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि इंदौर को नंबर वन बनाने का दावा करने वाले अधिकारियों की कागजी योजनाएं तब तक धरी की धरी हैं, जब तक कि सफाई मित्रों का श्रम उनके साथ न हो। विडंबना यह है कि जब बड़े-बड़े पुरस्कार समारोह होते हैं, तो इन असली नायकों को न तो मुख्य मंच पर बुलाया जाता है और न ही इन्हें वह आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा दी जाती है जिसके ये हकदार हैं। सालों से मस्टर और एनजीओ के भरोसे न्यूनतम वेतन पर काम कर रहे इन कर्मचारियों के कारण ही आज इंदौर का नाम पूरे देश में है। जब तक श्रम का सम्मान नहीं, तब तक उत्सव अधूरा
जब तक श्रम का सम्मान नहीं, तब तक उत्सव अधूरा
इस समय शहर के कई इलाकों में कचरा गाड़ी न आने से लोग परेशान हैं और बदबू के कारण घरों के दरवाजे बंद करने को मजबूर हैं। यह हड़ताल इंदौर प्रशासन के लिए एक बड़ी चेतावनी है। अगर इंदौर को वाकई में अपनी स्वच्छता का गौरव बनाए रखना है, तो सिर्फ अवार्ड बटोरने वाले हाथों को ही नहीं, बल्कि जमीन पर रात-दिन एक करने वाले उन ‘सफाई के असली हाथों’ को भी मंच पर बुलाकर हक और सम्मान देना होगा। जब तक इन पसीने से भीगे हाथों की जायज मांगें पूरी नहीं होंगी, तब तक इंदौर का नंबर वन होना सिर्फ एक कागजी दिखावा बनकर रह जाएगा।
