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सरकार से सवाल पूछना क्या ‘दिमागी नक्सल’ है?

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पंडित राजा रूपौलिहा

सरकार से सवाल पूछना क्या ‘दिमागी नक्सल’ है?

स्कूलों की बदहाली पूछो तो सवाल खटकता है, भ्रष्टाचार पर उंगली उठाओ तो विरोधी करार—आखिर जनता सवाल पूछे भी तो कैसे?

छतरपुर। मध्यप्रदेश।
लोकतंत्र में जनता सवाल पूछती है और सरकार जवाब देती है—यही लोकतंत्र की बुनियादी परंपरा है। लेकिन अगर स्कूलों की हालत पर सवाल उठाना, बेरोजगारी का हिसाब मांगना, महंगाई से परेशान परिवारों की आवाज उठाना और सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार पर जवाब मांगना ही “दिमागी नक्सल” कहलाने लगे, तो सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, पूरी व्यवस्था से है।

क्या सरकारी स्कूलों की स्थिति पूछना अपराध है?
क्या यह पूछना गलत है कि बच्चों की पढ़ाई कैसी चल रही है? कितने शिक्षक हैं, कितने पद खाली हैं और सरकारी स्कूलों में सुविधाओं की वास्तविक स्थिति क्या है?

क्या भ्रष्टाचार पर सवाल करना अपराध है?
जनता के टैक्स से पैसा आता है। सड़क, नाली, स्कूल, पंचायत और सरकारी योजनाओं में पैसा खर्च होता है। नागरिक पूछता है कि पैसा कहां गया, काम कितना हुआ और गुणवत्ता कैसी रही—तो उसे जवाब मिलना चाहिए, कोई तमगा नहीं।

बेरोजगार युवा रोजगार मांगता है तो क्या वह व्यवस्था का दुश्मन हो गया?
महंगाई से परेशान परिवार राहत मांगता है तो क्या वह सरकार विरोधी हो गया? किसान अपनी समस्या बताता है तो क्या वह राष्ट्रविरोधी हो गया?

सवाल पूछने वाला नागरिक लोकतंत्र को कमजोर नहीं करता। सवालों से भागने वाली व्यवस्था लोकतंत्र को कमजोर करती है।

‘दिमागी नक्सल’ का ठप्पा सवालों का जवाब नहीं

किसी नागरिक की बात से असहमति हो सकती है। उसकी आलोचना का जवाब तथ्यों से दिया जा सकता है। लेकिन असहमति को बदनाम करने के लिए कोई भारी-भरकम लेबल चिपका देना समस्या का समाधान नहीं है।

सरकार मजबूत है तो सवालों से क्यों घबराए?

जनता अगर पूछ रही है कि स्कूल क्यों बंद या मर्ज हो रहे हैं, सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था कैसी है, योजनाओं का पैसा कहां खर्च हुआ, नौकरियां कहां हैं और महंगाई पर राहत कब मिलेगी—तो इन सवालों के जवाब आंकड़ों और कार्रवाई के साथ दिए जाने चाहिए।

लोकतंत्र में ‘वाह-वाह’ करने वाले नागरिक से ज्यादा जरूरी वह नागरिक है जो पूछता है—“हिसाब बताइए।”

सरकार से सीधा सवाल

अगर हर आलोचना को विरोध और हर सवाल को षड्यंत्र मान लिया जाएगा, तो फिर लोकतंत्र में जनता की भूमिका क्या रह जाएगी?

जनता वोट देती है, टैक्स देती है और सरकार चुनती है। बदले में जनता को सवाल पूछने का अधिकार भी है।

इसलिए स्कूल, शिक्षा, भ्रष्टाचार, महंगाई और बेरोजगारी पर सवाल उठाने वाले हर नागरिक को कटघरे में खड़ा करने के बजाय सरकार को कटघरे में उठ रहे सवालों का तथ्यात्मक जवाब देना चाहिए।

क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना ‘दिमागी नक्सल’ नहीं—जागरूक नागरिक होने की निशानी है।

और अगर किसी सवाल का जवाब देना मुश्किल लग रहा है, तो सवाल पूछने वाले को बदनाम करने के बजाय उस सवाल का जवाब देना बेहतर होगा।

पंडित राजा रूपौलिहा

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