नई दिल्ली:
देश में हर साल लाखों युवा कॉलेज से डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन रोजगार के बाजार में उन्हें मायूसी ही हाथ लग रही है। नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट ने इस कड़वे सच से पर्दा उठाया है कि आखिर पढ़ाई पूरी करने के बावजूद नए ग्रेजुएट्स को नौकरियां क्यों नहीं मिल पा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, समस्या नौकरियों की कमी से ज्यादा युवाओं में इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से ‘स्किल्स’ (कौशल) की कमी का होना है।
डिग्री और स्किल के बीच बड़ा फासला
नीति आयोग के अध्ययन से सामने आया है कि हमारे उच्च शिक्षा संस्थानों का पाठ्यक्रम वर्तमान समय की कॉर्पोरेट और औद्योगिक जरूरतों से मेल नहीं खा रहा है। थ्योरी की पढ़ाई पर ज्यादा जोर होने के कारण छात्रों को व्यावहारिक (प्रैक्टिकल) अनुभव नहीं मिल पाता। जब ये ग्रेजुएट्स नौकरी के इंटरव्यू में बैठते हैं, तो वे कंपनियों की बुनियादी उम्मीदों पर भी खरे नहीं उतर पाते।
मुख्य कारण जो बन रहे हैं रुकावट:
पुराना पाठ्यक्रम: यूनिवर्सिटीज का सिलेबस मार्केट की नई तकनीकों और ट्रेंड्स के हिसाब से अपडेट नहीं है।
प्रैक्टिकल एक्सपोजर की कमी: थ्योरी ज्ञान तो भरपूर है, लेकिन वास्तविक काम (हैंड्स-ऑन एक्सपीरियंस) का अनुभव शून्य है।
सॉफ्ट स्किल्स का अभाव: कम्युनिकेशन स्किल्स, प्रॉब्लम सॉल्विंग और क्रिटिकल थिंकिंग जैसी जरूरी योग्यताओं में युवाओं का कमजोर होना।
इंडस्ट्री-अकादमिया गैप: कॉलेजों और कंपनियों के बीच सीधा संपर्क न होना, जिससे छात्रों को पता ही नहीं चलता कि मार्केट में किस चीज की मांग है।
नीति आयोग का सुझाव: बदलना होगा ढर्रा
रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि अगर इस स्थिति को बदलना है तो पारंपरिक शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव करने होंगे। नीति आयोग ने कॉलेजों को सुझाव दिया है कि वे अपनी पढ़ाई में वोकेशनल ट्रेनिंग, इंटर्नशिप और आधुनिक तकनीक (जैसे AI, डेटा एनालिसिस) को प्राथमिकता दें।
जब तक शिक्षा को केवल डिग्री बांटने का जरिया न बनाकर ‘रोजगार योग्य कौशल’ से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक डिग्री धारकों के सामने बेरोजगारी की यह चुनौती बनी रहेगी।
