भारतीय राजनीति में रचनात्मक विरोध, व्यंग्य और वैचारिक मतभेदों का हमेशा से स्थान रहा है। लेकिन जब कोई संगठन अपनी गतिविधियों को मुख्यधारा की राजनीति की ओर मोड़ता है, तो उसकी कानूनी वैधता और भाषा की शालीनता पर सवाल उठना लाजिमी हो जाता है। इन दिनों सोशल मीडिया पर सक्रिय ‘ककरोच जनता पार्टी’ (CJP) द्वारा भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के प्रमुख से 48 घंटे के भीतर इस्तीफे की मांग की गई है। किसी एक घटनाक्रम से मिली सफलता जब सही समय पर सही समझ के साथ न पचे, तो वह सीधे अहंकार का रूप ले लेती है। हाल ही में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को अपनी जीत मानकर ‘ककरोच जनता पार्टी’ (CJP) के नेताओं में जो सातवें आसमान पर चढ़ने वाला अहंकार उपजा है, उसने उनकी वैचारिक अपरिपक्वता की पोल खोल दी है। खुद को ‘उच्च शिक्षित’, आधुनिक और डिग्रीधारी बताने वाले इन तथाकथित डिजिटल नेताओं की भाषा शैली आज उनकी शिक्षा के वास्तविक स्तर पर सबसे बड़ा तंज बन चुकी है। देश के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व, प्रधानमंत्री और संवैधानिक पदों पर बैठे वरिष्ठों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से मर्यादाहीन और अभद्र शब्दावली का प्रयोग करना यह साबित करता है कि इन्होंने डिग्रियां तो शायद ले लीं, लेकिन संवाद की बुनियादी शालीनता और संस्कार सीखना भूल गए। आज सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही खड़ा होता है कि जो समूह एक मंत्री के हटने के बाद उपजे घमंड में अपनी जुबान का संतुलन खो बैठा और जिसका खुद का कोई कानूनी पंजीकरण तक नहीं है, क्या उसके असंयमित नेतृत्व पर देश के युवा अपने उज्ज्वल भविष्य का भरोसा कर सकते हैं?
1. कानूनी पंजीकरण का अभाव और संस्थागत साख
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक सुधारों या संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाने के लिए एक तय कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया होती है।
- निर्वाचन आयोग में कोई पंजीकरण नहीं: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के कड़े नियमों के तहत भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक सूची में CJP का नाम एक पंजीकृत दल के रूप में दर्ज नहीं है।
- अधिकार क्षेत्र पर सवाल: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जो संगठन खुद को देश के स्थापित कानूनी और राजनीतिक ढांचे के तहत पंजीकृत करने की बुनियादी प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाया है, उसके द्वारा देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था (ECI) को अल्टीमेटम देना तार्किक रूप से सही नहीं माना जा सकता। पंजीकरण की इस कमी के कारण संगठन की संस्थागत साख पर सवाल खड़े होते हैं।
राजनीतिक दल के रूप में शून्य पंजीकरण: भारत में किसी भी संगठन को राजनीतिक दल बनने के लिए चुनाव आयोग (ECI) में पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है। CJP का ऐसा कोई पंजीकरण नहीं है, जिसका अर्थ है कि यह कोई आधिकारिक राजनीतिक दल नहीं है।
अन्य कानूनी निकायों में भी अपंजीकृत: यह संगठन किसी सोसायटी (Society), ट्रस्ट (Trust), या गैर-सरकारी संगठन (NGO) के रूप में भी कहीं पंजीकृत नहीं है।
केवल एक डिजिटल कम्युनिटी: इनका एकमात्र वजूद इंटरनेट और उनकी खुद की वेबसाइट पर है, जहाँ यह एक सोशल मीडिया प्रेशर ग्रुप या आंदोलन के रूप में सक्रिय हैं। इनकी वेबसाइट पर मिलने वाली सदस्यता पूरी तरह सांकेतिक (Symbolic) है और इसका कोई कानूनी आधार नहीं है।
2. संवाद शैली और भाषा की मर्यादा का उल्लंघन
CJP के सदस्य और समर्थक सोशल मीडिया पर खुद को उच्च शिक्षित और आधुनिक प्रगतिशील सोच का हिस्सा बताते हैं, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर उनका आचरण इसके विपरीत दिखाई देता है।
- संवैधानिक पदों और वरिष्ठों के प्रति अनुचित भाषा: इस संगठन से जुड़े लोगों द्वारा सोशल मीडिया और वक्तव्यों में अपनी उम्र से वरिष्ठ, अनुभवी और देश के गरिमामयी संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों के खिलाफ बेहद अनुचित और अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया जा रहा है।
- शीर्ष नेतृत्व पर अभद्र टिप्पणी: हाल ही में आई रिपोर्टों के अनुसार, अभिजीत दीपके ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर हमला बोलते हुए सीधे देश के प्रधानमंत्री का नाम घसीटा और देश के सर्वोच्च राजनीतिक पद के संदर्भ में बेहद आपत्तिजनक और अमर्यादित शब्दावली का प्रयोग किया।
- संवाद के गिरते स्तर पर चिंता: किसी भी बौद्धिक विमर्श या वैचारिक आलोचना में भाषा की शुद्धता और बड़ों के प्रति सम्मान अनिवार्य माना जाता है। आलोचना और व्यक्तिगत आक्षेप के बीच का अंतर न समझ पाना यह दर्शाता है कि संगठन में प्रशासनिक व राजनीतिक परिपक्वता (Political Maturity) की भारी कमी है।
3. युवाओं के भविष्य और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का टकराव
CJP खुद को युवाओं के अधिकारों और उनकी समस्याओं को उठाने वाला मंच बताती है, लेकिन उनकी वर्तमान रणनीतियां युवाओं के लिए जोखिम पैदा कर रही हैं।
- राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए युवाओं का उपयोग: अपनी राजनीतिक पहचान स्थापित करने के लिए यह संगठन सोशल मीडिया पर युवाओं को तीखे और अनधिकृत राजनीतिक अभियानों के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि इन गैर-कानूनी और अमर्यादित गतिविधियों के कारण युवाओं पर कोई कानूनी कार्रवाई होती है, तो उनका शैक्षणिक और व्यावसायिक भविष्य हमेशा के लिए प्रभावित हो सकता है।
- सांकेतिक सदस्यता का दायरा: इनकी वेबसाइट पर जो डिजिटल आईडी कार्ड बांटे जा रहे हैं, उनका कोई कानूनी या आधिकारिक महत्व नहीं है। युवाओं को एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा बनाया जा रहा है जिसकी कोई कानूनी जवाबदेही तय नहीं है, जो अंततः युवाओं को भ्रम की स्थिति में डाल सकता है।
जवाबदेही और आत्ममंथन की आवश्यकता
‘ककरोच जनता पार्टी’ का वर्तमान रुख यह स्पष्ट करता है कि बिना कानूनी पंजीकरण और बिना भाषाई संयम के कोई भी आंदोलन दीर्घकालिक बदलाव नहीं ला सकता। यदि यह संगठन वास्तव में युवाओं की भलाई और व्यवस्था में सुधार चाहता है, तो उसे सबसे पहले खुद को कानून के दायरे में पंजीकृत कराना होगा और अपनी संवाद शैली में देश की संवैधानिक संस्थाओं, वरिष्ठों तथा शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व के प्रति सम्मान बहाल करना होगा। लोकतंत्र में रचनात्मक बदलाव नियमों और मर्यादाओं के पालन से ही संभव है।
