नई दिल्ली/ब्यूरो:
आज पूरा विश्व ‘विश्व संस्कृत दिवस’ (Sanskrit Diwas 2026) मना रहा है. सावन महीने की पूर्णिमा को मनाए जाने वाले इस वैश्विक आयोजन के मौके पर हमारी संपादकीय टीम ने यह समझने की कोशिश की कि आखिर क्यों सदियों पुरानी यह भाषा आज के इस आधुनिक, डिजिटल और एआई (AI) संचालित युग में भी पूरी तरह प्रासंगिक बनी हुई है।
अतीत से आधुनिकता का सफर: क्यों कंप्यूटर के अनुकूल है यह भाषा?
पत्रकारिता के दृष्टिकोण से जब हम इस भाषा की गहराई में उतरते हैं, तो सबसे दिलचस्प पहलू इसका ‘व्याकरण और विज्ञान’ सामने आता है। महान भाषाविद पाणिनी द्वारा रचित ‘अष्टाध्यायी’ के करीब 4,000 नियम इस भाषा को दुनिया का सबसे सटीक ढांचा देते हैं। यही कारण है कि आज नासा (NASA) से लेकर दुनिया भर के टेक वैज्ञानिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग कोडिंग के लिए संस्कृत को सबसे आदर्श और त्रुटिहीन (Error-free) भाषा मान रहे हैं।
यूथ ओरिएंटेशन: रील्स और रैप में गूंज रहे हैं श्लोक
ग्राउंड जीरो से हमारे प्रतिनिधियों की रिपोर्ट बताती है कि संस्कृत अब केवल ‘पूजा-पाठ’ या ‘कर्मकांड’ तक सीमित नहीं है। देश और दुनिया के युवाओं के बीच इस भाषा को लेकर एक नया ‘क्रेज’ देखा जा रहा है। इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स पर संस्कृत के श्लोकों को आधुनिक हिप-हॉप बीट्स, रैप और फ्यूजन म्यूजिक के साथ पेश किया जा रहा है। युवाओं का कहना है कि संस्कृत बोलने से न केवल उनका उच्चारण (Pronunciation) साफ होता है, बल्कि यह उनकी मानसिक एकाग्रता को भी बढ़ाता है।
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वैश्विक मंच पर संस्कृत का दबदबा
संसदीय गलियारों और वैश्विक कूटनीति में भी संस्कृत की धमक साफ देखी जा सकती है। केवल भारत के ही शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि जर्मनी, अमेरिका और ब्रिटेन के शीर्ष विश्वविद्यालय आज ‘संस्कृत रिसर्च’ पर करोड़ों का निवेश कर रहे हैं। दुनिया भर के शोधकर्ता भारतीय आयुर्वेद, योग और खगोल विज्ञान के मूल ग्रंथों को समझने के लिए बड़े पैमाने पर इस भाषा को सीख रहे हैं।
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राजनीतिक और प्रशासनिक पहल
प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सहित देश की शीर्ष राजनीतिक हस्तियों ने आज सोशल मीडिया के माध्यम से जनता से अपील की है कि वे दैनिक जीवन में कम से कम एक वाक्य संस्कृत का जरूर उपयोग करें। सरकारी स्तर पर भी ‘संस्कृत ग्राम’ जैसी योजनाओं के माध्यम से इसे जन-जन की भाषा बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
संपादकीय टिप्पणी:
एक पत्रकार के रूप में यह साफ है कि संस्कृत मृत नहीं, बल्कि एक ‘जीवंत और गतिशील’ धरोहर है। चुनौती इसे सहेजने की नहीं, बल्कि इसे अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाने की है, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस महान विरासत से कटी न रहें।



