छात्राओं ने सीखी जल परीक्षण की विधि
पानी की हर बूंद की गुणवत्ता परखी
गांवों और बैतूल शहर के विभिन्न वार्डों से लाए पानी के नमूनों की जांच की
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बैतूल। जल के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं है और पृथ्वी पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों में जल का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। इसी जल की गुणवत्ता और शुद्धता के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से 22 अगस्त को ई.एफ.ए. शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बैतूल गंज में छात्राओं को पानी की जांच करने की विधि का प्रायोगिक प्रशिक्षण दिया गया। शिक्षक महेश गुंजेले के मार्गदर्शन में छात्राओं ने अलग-अलग ग्रामों, वार्डों और विद्यालय में उपलब्ध पानी के नमूने एकत्र कर उनकी गुणवत्ता का परीक्षण किया।
जानकारी देते हुए शिक्षक महेश गुंजेले ने बताया कि प्राकृतिक जल सबसे शुद्धतम रूप माना जाता है, लेकिन यह पूर्णतः शुद्ध अवस्था में उपलब्ध नहीं होता। इसमें कुछ अशुद्धियां प्राकृतिक रूप से मौजूद रहती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए छात्राओं ने अपने ग्राम और वार्डों से पीने के पानी के नमूने एकत्र किए। इनमें ग्राम जुनावानी, रतनपुर, केलापुर, महुपानी, बाजपुर, उमरी जागीर, सोनाघाटी, पांगरा, भयावाड़ी, कोसमी, गवाईढाना, बुण्डाला और झाड़ेगांव के अलावा बैतूल शहर के संजय कॉलोनी, हमलापुर, कम्पनी गार्डन, गणेश वार्ड, विवेकानंद वार्ड, भग्गूढाना, महावीर वार्ड, रामनगर, अर्जुन नगर, सुभाष वार्ड, कालापाठा और सदर क्षेत्र के पानी के नमूने शामिल रहे।
छात्राओं ने हैंडपंप, बोर और नल के पानी की जांच करते हुए मुख्य रूप से पीएच मान, क्लोरीन, हार्डनेस, क्लोराइड, अल्कालिनिटी, आयरन, नाइट्रेट, टर्बिडिटी, फ्लोराइड और अमोनिया सहित अन्य परीक्षण किए। इसके साथ ही उन्हें पानी में मौजूद विभिन्न रासायनिक तत्वों की अधिक मात्रा से मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की जानकारी भी दी गई।
प्रशिक्षण के दौरान बताया गया कि बोरॉन और पारा तंत्रिका तंत्र एवं मस्तिष्क को प्रभावित कर सकते हैं। क्लोराइड सोडियम के साथ मिलकर रक्तचाप बढ़ाने का कारण बन सकता है। शीशा बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास में बाधा डालने के साथ एनीमिया का कारण बन सकता है और वयस्कों में किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है। नाइट्रेट शिशुओं में ब्लू बेबी सिंड्रोम यानी मेथेमोग्लोबिनेमिया का कारण बन सकता है। कीटनाशक कैंसर के साथ तंत्रिका तंत्र, प्रजनन प्रणाली और रोग प्रतिरोधक क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इसी तरह कैल्शियम की अधिकता से कब्ज और गुर्दे की पथरी, फ्लोराइड की अधिकता से दांतों में खराबी, फ्लोरोसिस, हड्डियों के विकार और जोड़ों की समस्या हो सकती है। सोडियम की अधिक मात्रा हृदय, गुर्दे और रक्त परिसंचरण संबंधी रोगों से पहले से पीड़ित लोगों के लिए अधिक नुकसानदायक हो सकती है। आयरन पेट संबंधी बीमारियों में वृद्धि का कारण बन सकता है, जबकि सल्फेट मैग्नीशियम के साथ मिलकर दस्त की समस्या पैदा कर सकता है। कैडमियम हड्डियों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है तथा आर्सेनिक त्वचा रोगों और कैंसर का कारण बन सकता है।
– पानी की समय-समय पर जांच कराते रहना आवश्यक
छात्राओं ने विद्यालय में उपलब्ध पानी और आर.ओ. के पानी का भी परीक्षण किया। जांच में दोनों का पीएच मान 7.5 पाया गया। वहीं विभिन्न ग्रामों और वार्डों से लाए गए पानी के नमूनों का पीएच मान 7.5 से 8.5 के बीच पाया गया, जिसे स्वीकार्य बताया गया। पानी में फ्लोराइड की मात्रा 0.5 से 1.00 मिलीग्राम प्रति लीटर पाई गई, जो भारतीय मानक ब्यूरो एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन की निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुरूप बताई गई।
प्रशिक्षण के दौरान छात्राओं को बताया गया कि सभी लोगों को गुणवत्ता युक्त पानी का सेवन करना चाहिए और पानी की समय-समय पर जांच कराते रहना आवश्यक है। इससे पानी में मौजूद तत्वों की कमी अथवा अधिकता का पता लगाया जा सकता है और आवश्यकता के अनुसार सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित किया जा सकता है। छात्राओं ने पानी की गुणवत्ता जांचने की विधि शिक्षक महेश गुंजेले के मार्गदर्शन में प्रायोगिक रूप से सीखी।
