यह कहानी है साल 1959 की, जिसने न सिर्फ बॉम्बे (अब मुंबई) के रसूखदार समाज को हिलाकर रख दिया था, बल्कि भारत की पूरी न्याय व्यवस्था को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया था। यह एक ऐसा मामला था जिसके बाद भारत सरकार को देश से ज्यूरी सिस्टम (Jury System) को हमेशा के लिए खत्म करना पड़ा।
प्यार, वफादारी और पीठ में छुरा
कहानी के मुख्य किरदार थे कमांडर कावास मानेकशॉ नानावटी। वे भारतीय नौसेना (Indian Navy) के एक बेहद जांबाज, ईमानदार और हैंडसम अधिकारी थे। उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में भी हिस्सा लिया था। उनकी पत्नी सिल्विया एक ब्रिटिश महिला थीं। दोनों की शादीशुदा जिंदगी बेहद खुशहाल चल रही थी और उनके तीन बच्चे थे।
नेवी की ड्यूटी के कारण कमांडर नानावटी अक्सर महीनों तक पानी के जहाज पर देश की सुरक्षा में तैनात रहते थे। इसी अकेलेपन के दौरान सिल्विया की मुलाकात बॉम्बे के रईस और प्लेबॉय छवि के सिंधी बिजनेसमैन प्रेम आहूजा से हुई। आहूजा ने सिल्विया को अपने प्यार के जाल में फंसा लिया और दोनों के बीच अवैध संबंध (Extra-marital affair) बन गए। सिल्विया आहूजा से शादी के सपने देख रही थी, लेकिन आहूजा सिर्फ उसका इस्तेमाल कर रहा था।
27 अप्रैल 1959: वो खौफनाक शाम
27 अप्रैल 1959 की दोपहर, सिल्विया का जमीर जागा और उसने रोते हुए अपने पति कमांडर नानावटी को प्रेम आहूजा के साथ अपने रिश्तों का पूरा सच बता दिया। नानावटी अपनी वफादार पत्नी और दोस्त के इस धोखे को बर्दाश्त नहीं कर पाए। उन्होंने बेहद शांति से काम लिया। पहले वे अपने बच्चों और पत्नी को सिनेमा हॉल छोड़कर आए, फिर नेवी के बेस पर जाकर आधिकारिक बहाने से अपनी सर्विस रिवॉल्वर (पिस्तौल) और 6 कारतूस इश्यू कराए।
शाम के करीब 4:45 बजे, नानावटी सीधे प्रेम आहूजा के आलीशान फ्लैट पर पहुंचे। आहूजा अभी-अभी नहाकर तौलिए में बाहर निकला था। नानावटी ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा—“क्या तुम मेरी पत्नी सिल्विया से शादी करोगे और मेरे बच्चों को अपनाओगे?”
प्रेम आहूजा ने बेहद घमंड से जवाब दिया—“क्या मैं हर उस औरत से शादी करूँगा, जिसके साथ मैं सोता हूँ?”
यह सुनते ही कमांडर नानावटी के सब्र का बांध टूट गया। बेडरूम के भीतर एक के बाद एक तीन गोलियां चलने की आवाज गूंजी और प्रेम आहूजा खून से लथपथ होकर फर्श पर गिर पड़ा। उसकी मौके पर ही मौत हो गई। कत्ल करने के बाद नानावटी सीधे वहां से निकले, पहले नेवी के अपने सीनियर अफसर को इस बात की जानकारी दी और फिर सीधे जाकर मुंबई पुलिस के सामने आत्मसमर्पण (Surrender) कर दिया।
जब पूरा देश कातिल के साथ खड़ा हो गया (द मीडिया ट्रायल)
जब यह मामला अदालत में पहुंचा, तो बॉम्बे में एक अभूतपूर्व नजारा देखने को मिला। उस दौर में भारत में ‘ज्यूरी सिस्टम’ हुआ करता था, यानी जज अकेले फैसला नहीं सुनाते थे, बल्कि समाज के 9 प्रतिष्ठित नागरिक (ज्यूरी) बैठकर तय करते थे कि आरोपी दोषी है या नहीं।
उस समय के मशहूर अखबार ‘ब्लिट्ज़’ (Blitz) ने कमांडर नानावटी को एक ‘देशभक्त और स्वाभिमानी पति’ के रूप में पेश किया, जिसने अपनी पत्नी के सम्मान के लिए कदम उठाया, जबकि मरे हुए प्रेम आहूजा को एक ‘लंपट और धोखेबाज’ दिखाया गया। हालात ये थे कि बॉम्बे की सड़कों पर नानावटी के समर्थन में रैलियां निकलने लगीं। लोग अदालत के बाहर नानावटी की एक झलक पाने के लिए हजारों की तादाद में जमा होने लगे। यहाँ तक कि नानावटी की पारसी कम्युनिटी और खुद नेवी के बड़े अफसर उनके पक्ष में खड़े हो गए।
जनता के इस भारी जनसैलाब और भावनाओं का असर ज्यूरी के सदस्यों पर भी पड़ा। अदालत में सरकारी वकील ने वैज्ञानिक साक्ष्यों से साबित कर दिया था कि नानावटी ने सोच-समझकर प्री-प्लान्ड मर्डर किया है, लेकिन इसके बावजूद ज्यूरी ने 8-1 के भारी बहुमत से नानावटी को ‘बेकसूर’ (Not Guilty) घोषित कर दिया!
⚖️ जब जज ने पलटा फैसला और खत्म हुआ ‘ज्यूरी सिस्टम’
ज्यूरी के इस अजीब और भावनात्मक फैसले से केस के जज जस्टिस सेशन जज के.यू. लक्ष्मणराव सहमत नहीं थे। उन्होंने इस फैसले को खारिज कर दिया और मामले को सीधे बॉम्बे हाईकोर्ट को रेफर कर दिया।
हाईकोर्ट ने मामले की दोबारा गहनता से सुनवाई की। अदालत ने कहा कि कानून भावनाओं से नहीं, सबूतों से चलता है। नानावटी ने सिल्विया के खुलासे और कत्ल के बीच करीब 3 घंटे का समय लिया था, जिसका मतलब है कि उनका गुस्सा ठंडा हो चुका था और उन्होंने सोच-समझकर हथियार हासिल किया था। इसलिए इसे ‘अचानक आई उत्तेजना’ (Grave and Sudden Provocation) नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने नानावटी को दोषी पाते हुए उम्रकैद (Life Imprisonment) की सजा सुनाई, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा।
इस केस ने साबित कर दिया कि आम जनता (ज्यूरी) मीडिया और जनभावनाओं के बहकावे में आकर गलत फैसला दे सकती है। इसी वजह से इस ऐतिहासिक केस के बाद भारत सरकार ने देश की अदालतों से ज्यूरी सिस्टम को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।
पर्दे के पीछे का राजनीतिक समझौता और अंत
कमांडर नानावटी को उम्रकैद तो हो गई, लेकिन उनकी लोकप्रियता कम नहीं हुई थी। वे करीब 3 साल तक जेल में रहे। इसी बीच पर्दे के पीछे एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम चल रहा था। महाराष्ट्र के तत्कालीन राज्यपाल विजयलक्ष्मी पंडित (जो जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं) के पास दो दया याचिकाएं लंबित थीं—एक कमांडर नानावटी की और दूसरी भाई प्रताप नाम के एक सिंधी व्यापारी की।
सिंधी समुदाय प्रेम आहूजा के मर्डर से नाराज था और पारसी समुदाय नानावटी के साथ था। तब एक राजनीतिक समझौता हुआ, जिसके तहत सिंधी समुदाय भाई प्रताप की रिहाई के बदले नानावटी को माफ करने पर राजी हो गया। 1962 में कमांडर नानावटी को आधिकारिक रूप से क्षमा (Pardon) कर दिया गया और वे जेल से बाहर आ गए।
जेल से छूटने के बाद कमांडर नानावटी अपनी पत्नी सिल्विया और बच्चों के साथ हमेशा के लिए कनाडा चले गए, जहाँ उन्होंने एक नई जिंदगी की शुरुआत की। साल 2003 में कनाडा में ही कमांडर नानावटी की मौत हो गई, जबकि उनकी पत्नी सिल्विया ने भी उनका ताउम्र साथ निभाया। इस ऐतिहासिक मर्डर मिस्ट्री पर बॉलीवुड में ‘रुस्तम’ और ‘अचानक’ जैसी सुपरहिट फिल्में भी बन चुकी हैं।
