जन्माष्टमी स्पेशल
काले पत्थरों से अंकित अति प्राचीन मूर्ति 18 वीं शताब्दी का चारभुजा नाथ मंदिर इतिहास
खुर,कुंभ, कलश मुखमंडप, मंडप, अंतराल तथा मंदिर का गर्भगृह नागर शैली के शिखर से युक्त है,

जितेंद्र चौहान
अमझेरा।नगर के मध्य चारभुजानाथ मंदिर स्थित है।मंदिर यहां की वैष्णव परंपरा का प्रमुख स्मारक है। जिला प्रशासन स्वयं इस मंदिर का उल्लेख करता है। यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि अमझेरा में जहां महादेव, चामुंडा और अंबिका माता जैनसे शैव-शाक्त देवालयों की उपस्थिति है, वहीं चारभुजानाथ मंदिर इस नगर की धार्मिक संरचना में वैष्णव साधना की स्पष्ट और प्रतिष्ठित उपस्थिति को दर्शाता है। इस प्रकार यह मंदिर अमझेरा की बहुपरंपरागत धार्मिक पहचान का सशक्त अंग बनकर सामने आता है।

चारभुजानाथ मंदिर का महत्व केवल उसकी आस्था में नहीं, बल्कि उसकी स्थापत्य-संरचना में भी है। पुरातात्विक विवरणों के अनुसार यह मंदिर ऊँचे चबूतरे पर निर्मित है और इसकी योजना में खुर,कुंभ, कलश मुखमंडप, मंडप, अंतराल तथा गर्भगृह सम्मिलित हैं। मंदिर का गर्भगृह नागर शैली के शिखर से युक्त है, जबकि मंडप और मुखमंडप में गुंबदाकार रूप दिखाई देता है। इतिहास बताता है कि मंदिर का निर्माण केवल पूजा-व्यवस्था को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि स्थापत्य-संतुलन और सौंदर्यबोध को सामने रखकर किया गया था।
मंदिर का वैष्णव स्वरूप उसकी मूर्तिकला और अलंकरण में विशेष रूप से प्रकट होता है। भगवान चारभुजा नाथ अपने अंगरक्षक जय-विजय और उनकी पत्नियां एक साथ दिखाई देते है। भगवान के बांई और लक्ष्मी माता और दाहिनी तरफ वरुण देव विराजमान है।गर्भगृह के मुख्य द्वार पर पर विष्णु तथा उनके दशावतारों का चित्रण दर्शाया गया है। प्रवेश द्वार के दोनों ओर स्थित गवाक्षों में गरुड़ और गणेश जी की मूर्ति स्थित हैं। यह संयोजन अत्यंत विचारपूर्ण है। देख कर लगता है कि विष्णु और दशावतार मंदिर की मूल वैष्णव अधिष्ठान-भावना को स्पष्ट करते हैं, जबकि मंदिर मे गरुड़ जी की उपस्थिति उस परंपरा को और दृढ़ करती है। साथ ही गणेश जी की सीधे हाथ सूंड वाली मूर्ति स्थित है। मंदिर की कलाकृतियां एवं मूर्तियां देखकर ऐसा लगता है कि मंदिर-रचना हजारों वर्ष पुरानी है, जिसमें पूजा भाव के साथ स्थापत्य स्तरों पर देव-संरचना का भाव देखा जाता है।
मंदिर के स्तंभों की पौराणिक कलाकृतियां आश्चर्यजनक है इसके स्तंभों पर पत्र-अलंकरण, सूक्ष्म सज्जा और भारावाही के साथ देवीय चित्रण शिल्पकला मे स्थित है। जो की स्तंभों के आधे भाग पर देखे जा सकते है। यह मंदिर दिखावे की दृष्टि से नहीं बल्कि प्राचीन कलात्मकता को दर्शाता है।

मंदिर शैली के आधार पर 18वीं शताब्दी का माना जाता है। अमझेरा के अनेक प्रमुख स्थापत्य अवशेषों का संबंध भी इसी से जोड़ा जाता है। यह कहना ठीक होगा की चारभुजानाथ मंदिर अमझेरा के उस ऐतिहासिक चरण का सजीव प्रमाण है, जब नगर केवल प्रशासनिक या रियासती केंद्र नहीं था बल्कि आस्था और शिल्प कला के संयुक्त विकास का भी केंद्र था।
मंदिर के पुजारी राम शर्मा ने बताया की हमारा परिवार तो केवल 30 वर्षों से यहां पूजा पाठ कर्ता आ रहा है। मंदिर की मान्यता तो बहुत पुरानी है। मंदिर पुरातत्व विभाग के अधीन है। आज चारभुजानाथ मंदिर केवल एक पूजा मात्र स्थल के रूप में रह गया है। अमझेरा की स्थानीय मान्यता में चारभुजानाथ मंदिर को 16वीं शताब्दी के राठौरकालीन धार्मिक स्थापत्य से संबद्ध माना जाता है।
20 लाख की लागत से मंदिर की प्राचीन आकृतियों को फिर से ऊंकारा
मंदिर में स्थित शिल्पी कलाकृतियां पूर्ण रूप जर्जर हो गई थी। मंदिर की रखने के लिए पुरातत्व विभाग द्वारा गरीब 20 लाख रूपये की लागल से मंदिर की हजारों वर्ष पुरानी कलाकृतियों के साथ उसकी प्राचीनता को यथावत ओर जीवंत रखने के लिए नवीन कार्य किए गए। अब मंदिर फिर से अपने प्राचीन स्वरूप में निखरता दिखाई दे रहा है।


