Sunday, October 11, 2026

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सवाल पूछो तो ‘टैग’ मिलेगा: क्या भारतीय राजनीति और समाज से ‘निष्पक्ष संवाद’ ख़त्म हो चुका है?

आज का भारत एक ऐसे वैचारिक मोड़ से गुज़र रहा है जहाँ किसी भी मुद्दे पर स्वस्थ बहस, तर्क-वितर्क या सामान्य बातचीत करना भी लगभग असंभव होता जा रहा है। चाहे सत्तापक्ष के समर्थक हों या विपक्ष के, आज समाज के हर हिस्से में एक अजीब सी बेचैनी और असहिष्णुता दिखाई देती है। आज हर कोई सिर्फ अपनी पसंद के सवाल सुनना और अपने पसंदीदा एजेंडे के पक्ष में जवाब देखना चाहता है। अगर आप इस तय दायरे से बाहर निकलकर कोई ऐसा कड़वा सवाल पूछ लें जो सामने वाले को असहज कर दे, तो आपको तथ्यों के साथ जवाब नहीं मिलेगा। जवाब की जगह आपको तुरंत एक ‘टैग’ या ‘लेबल’ थमा दिया जाएगा, ताकि आपकी आवाज़ को हमेशा के लिए दबाया जा सके।

राजनीति, मीडिया और सोशल मीडिया के इस दौर में अब संवाद (Dialogue) की जगह पूरी तरह से ‘नामकरण की राजनीति’ (Labeling Politics) ने ले ली है। यह प्रवृत्ति न केवल हमारी बौद्धिक क्षमता को नुकसान पहुँचा रही है, बल्कि हमारे लोकतंत्र की बुनियाद को भी धीरे-धीरे खोखला कर रही है।

शब्दों का नया हथियार: जब सवाल पूछने वाले की नीयत पर हमला होता है

आज के राजनीतिक परिदृश्य में वैचारिक ध्रुवीकरण (Polarization) इस चरम स्तर पर पहुँच चुका है कि हर असहमत आवाज़ को ख़ारिज करने के लिए कुछ खास शब्दों को बकायदा हथियारों की तरह इस्तेमाल किया जाता है।

यदि आप वर्तमान सरकार की नीतियों, बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी, इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों या किसी प्रशासनिक विफलता पर सवाल उठाते हैं, तो आपको समस्याओं का समाधान ढूंढने वाले तार्किक नागरिक के रूप में नहीं देखा जाता। सत्तापक्ष की सोशल मीडिया आर्मी या उनके कट्टर समर्थक आपको तुरंत ‘चमचा’, ‘टूलकिट गैंग’, ‘अर्बन नक्सल’ या ‘देशविरोधी’ घोषित कर देते हैं। ऐसा करके वे सीधे आपके चरित्र और आपकी देशभक्ति पर सवाल खड़ा कर देते हैं, जिससे मूल मुद्दा वहीं दफन हो जाता है।

ठीक यही रवैया दूसरी तरफ भी देखने को मिलता है। जब आप विपक्ष से उनके राजनीतिक विज़न, आंतरिक लोकतंत्र, गठबंधन की मजबूरियों, या उनके अतीत के फैसलों पर कोई तीखा सवाल करते हैं, तो विपक्ष के समर्थक और उनकी फौज आपको ‘गोदी मीडिया’, ‘अंधभक्त’, ‘गोदी पत्रकार’ या ‘बिकाऊ’ का तमगा थमा देती है। उनके लिए हर वह व्यक्ति बिकाऊ या पक्षपाती है जो उनके शीर्ष नेताओं की नीतियों में कमियाँ ढूँढता है।

इस पूरी प्रक्रिया में सबसे खतरनाक बात यह है कि बहस कभी भी ‘तथ्यों’ पर नहीं होती। सवाल का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वाले की नीयत और उसके बैकग्राउंड पर हमला करना (Ad Hominem) इस दौर की सबसे बड़ी और कड़वी सच्चाई बन चुका है।

‘सिलेक्टिव लिसनिंग’ और ‘इको चैंबर’ का बढ़ता मनोवैज्ञानिक जाल

मनोविज्ञान और मीडिया स्टडीज में इस सामाजिक बीमारी को ‘सिलेक्टिव लिसनिंग’ (Selective Listening) और ‘कन्फर्मेशन बायस’ (Confirmation Bias) कहा जाता है। इसका सीधा मतलब है कि लोग अब सच जानने में रुचि नहीं रखते, वे सिर्फ अपने पहले से तय नैरेटिव (Narrative) की पुष्टि चाहते हैं। वे केवल उन्हीं सूचनाओं को स्वीकार करते हैं जो उनके राजनीतिक झुकाव को सही साबित करती हैं, और हर उस जानकारी को सिरे से नकार देते हैं जो उनके पसंदीदा नेता की छवि को नुकसान पहुँचाती है।

इस मनोवैज्ञानिक समस्या को और अधिक हिंसक बनाने का काम सोशल मीडिया (फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब) के एल्गोरिदम ने किया है। आप जिस तरह की राजनीतिक विचारधारा या वीडियो को लाइक करते हैं या समय बिताते हैं, आपके मोबाइल की स्क्रीन आपको वैसी ही वीडियो, मीम्स और पोस्ट बार-बार दिखाती जाती है। धीरे-धीरे व्यक्ति एक ‘इको चैंबर’ (Echo Chamber) में कैद हो जाता है, जहाँ उसे सिर्फ अपनी ही सोच की गूँज सुनाई देती है। इस बंद कमरे में रहते-रहते उसे यह भ्रम हो जाता है कि जो उसकी सोच से सहमत है, सिर्फ वही देश का शुभचिंतक है और बाकी पूरी दुनिया या तो बिकी हुई है, या पूरी तरह से मूर्ख है।

लोकतंत्र और समाज के लिए इसके दूरगामी खतरे

इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र की असली ताकत राजा-महाराजाओं की तरह दरबारियों से ‘तारीफें और कसीदे’ सुनने में नहीं, बल्कि जनता और स्वतंत्र मीडिया के ‘तीखे और असहज करने वाले सवालों’ में होती है। जब देश की आम जनता भी नेताओं और प्रवक्ताओं की तरह इस ‘लेबलिंग पॉलिटिक्स’ का हिस्सा बन जाती है, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है:

  • जवाबदेही का पूरी तरह ख़त्म होना: जब सवाल पूछने वाले हर नागरिक या पत्रकार को किसी न किसी खेमे का बताकर बदनाम कर दिया जाएगा, तो सत्ता या विपक्ष में बैठे ताकतवर लोगों से जनता के हक का हिसाब कौन माँगेगा? नेता समझ जाएंगे कि उन्हें जवाब देने की ज़रूरत नहीं है, बस सवाल उठाने वाले पर एक टैग लगा देना ही काफी है।
  • बौद्धिक शून्यता और कट्टरता: जब समाज में तार्किक सोच और रचनात्मक आलोचना के लिए जगह नहीं बचती, तो वहाँ नए विचारों का आना बंद हो जाता है। समाज में सिर्फ नफ़रत, अंधविश्वास और अंधभक्ति का माहौल तैयार होता है, जहाँ लोग तथ्यों के बजाय भावनाओं और झूठे नैरेटिव के सहारे जीने लगते हैं।
  • निष्पक्षता की भारी कीमत: आज के दौर में जो पत्रकार, डिजिटल क्रिएटर या आम नागरिक वास्तव में निष्पक्ष रहकर दोनों पक्षों की कमियों को उजागर करना चाहता है, उसकी स्थिति सबसे ज़्यादा दयनीय है। उसे ‘न्यूट्रल’ रहने की कीमत दोनों ही तरफ से गालियाँ, धमकियाँ और ट्रोलिंग झेलकर चुकानी पड़ती है।

इस जाल से बाहर निकलने का रास्ता क्या है?

नेताओं और राजनीतिक दलों का बुनियादी स्वभाव हमेशा से यही रहा है कि वे अपनी नाकामियों को छिपाएं और असहज करने वाले सवालों से बचकर निकल जाएं। लेकिन एक जागरूक और पढ़े-लिखे नागरिक के तौर पर हमें यह सोचना होगा कि क्या हम उनके इस राजनीतिक खेल का मोहरा बन रहे हैं?

अगली बार जब आप डिजिटल मीडिया या अपने आस-पास किसी को कोई बुनियादी सवाल उठाते हुए देखें—चाहे वह सत्ता से हो या विपक्ष से—तो उसे तुरंत ‘गोदी’ या ‘चमचा’ का टैग देने की बजाय, एक पल के लिए ठहरें। उसके सवाल की गहराई को समझें।

आखिरकार, हमें यह तय करना ही होगा कि हम भारत को कैसा समाज बनाना चाहते हैं—एक ऐसा समाज जो कड़वे सच का सामना करने और खुद में सुधार करने की हिम्मत रखता हो, या ऐसा समाज जो सिर्फ मीठे झूठ और खोखली तारीफों के सहारे अंदर ही अंदर कमज़ोर हो रहा हो? फैसला हमेशा जनता के हाथ में होता है।

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