हम बच्चों को नहीं समझ पा रहे या बच्चे हमें?
कल की घटना ने हर किसी को झकझोर दिया और हर माता-पिता को सोचने पर मजबूर कर दिया। एक महंगे मोबाइल फोन की जिद ने तीन जिंदगियां खत्म कर दीं। सवाल यह है कि आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनी? क्या किसी वस्तु, ब्रांड या इच्छा की कीमत इंसानी जिंदगी से बड़ी हो सकती है?
हो सकता है माता-पिता की आर्थिक परिस्थितियां ऐसी न हों कि वे अपने बच्चे को महंगा आईफोन या कोई दूसरी ब्रांडेड वस्तु खरीदकर दे सकें। लेकिन जब बच्चे अपने आसपास के लोगों को ऐसी चीजों का इस्तेमाल करते देखते हैं, तो उनके मन में तुलना शुरू हो जाती है—“उसके पास आईफोन है, हमारे पास क्यों नहीं?” धीरे-धीरे यही तुलना प्रतिस्पर्धा और फिर हीनभावना का रूप लेने लगती है।
आखिर यह हीनभावना बच्चों के मन में आती कहां से है?
बच्चों को बचपन से ही यह समझाने की जरूरत है कि हर परिवार की अपनी परिस्थितियां और अपनी क्षमताएं होती हैं। माता-पिता अपनी सामर्थ्य के अनुसार बच्चों के लिए जितना कर सकते हैं, उतना करते हैं। किसी दूसरे को देखकर अपनी इच्छाएं बढ़ाना और फिर उन इच्छाओं को पूरा करने के लिए माता-पिता पर लगातार दबाव बनाना आखिर किस तरह की सोच है?
आज की युवा पीढ़ी के सामने यह एक गंभीर सवाल है। एक-दूसरे को देखकर अपनी चाहत पूरी करने की होड़, सोशल मीडिया पर दिखावे की प्रतिस्पर्धा और हर इच्छा को अपना अधिकार समझ लेने की प्रवृत्ति क्या हमारी आने वाली पीढ़ी की दिशा बनती जा रही है?
यह समाज के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।
हो सकता है बच्चा अपने माता-पिता की आर्थिक और पारिवारिक परिस्थितियों को पूरी तरह समझ न पाया हो, लेकिन हमें यह भी सोचना होगा कि क्या माता-पिता अपने बच्चे की भावनाओं, मानसिक स्थिति और उसके भीतर चल रहे द्वंद्व को समझ पाए?
माता-पिता का दायित्व केवल बच्चों की हर इच्छा पूरी करना नहीं है। उनका सबसे बड़ा दायित्व बच्चों के साथ संवाद बनाए रखना, उनकी भावनाओं को समझना और उन्हें यह विश्वास दिलाना है कि किसी भी परिस्थिति में वे अकेले नहीं हैं। लेकिन हर जिद पूरी कर देना भी प्यार नहीं है। कई बार जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार और हर मांग को पूरा करने की आदत बच्चों को जिद्दी और असहनशील बना देती है।
वहीं दूसरी ओर, बच्चों की हर मांग को केवल जिद कहकर नजरअंदाज कर देना भी सही नहीं है। उन्हें सुनना, समझना और उनकी जरूरत तथा इच्छा के बीच का अंतर समझाना भी उतना ही जरूरी है।
हां, अगर बच्चे पढ़ाई, शिक्षा या अपने भविष्य से जुड़ी किसी आवश्यक सुविधा की मांग करते हैं, तो माता-पिता को अपनी क्षमता के अनुसार उन्हें वह सुविधा जरूर उपलब्ध करानी चाहिए। क्योंकि शिक्षा से बड़ा तोहफा बच्चों के लिए कोई नहीं हो सकता। लेकिन महंगे मोबाइल, ब्रांडेड कपड़े, गैजेट या दिखावे की चीजों को जीवन की जरूरत समझ लेना उचित नहीं है।
आज माता-पिता के सामने एक कठिन सवाल खड़ा है—अगर बच्चों की हर जिद पूरी करें तो वे बिगड़ सकते हैं और अगर उनकी हर मांग पूरी न करें तो कहीं वे कोई गलत कदम न उठा लें। आखिर माता-पिता करें तो क्या करें?
इसका जवाब शायद सिर्फ बच्चों में नहीं, बल्कि पूरे परिवार की सोच और संवाद में छिपा है।
हमें अपने बच्चों को यह सिखाना होगा कि असफलता जिंदगी का अंत नहीं है। अभाव जिंदगी का हिस्सा है। मनचाही चीज न मिलना भी जिंदगी का हिस्सा है। हर इच्छा पूरी होना जरूरी नहीं, लेकिन हर परिस्थिति में खुद को संभालना जरूरी है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आज के युवाओं में सहनशक्ति इतनी कम क्यों होती जा रही है? क्या हम अपने बच्चों को यह सिखा पा रहे हैं कि जिंदगी में हर चीज हमारे मन मुताबिक नहीं होती? क्या हम उन्हें यह समझा पा रहे हैं कि किसी वस्तु का न मिलना असफलता नहीं है और किसी दूसरे से पीछे रह जाना जिंदगी की हार नहीं है?
बच्चों को केवल सुविधाएं नहीं, संस्कार भी चाहिए।
केवल महंगे सामान नहीं, संवाद भी चाहिए।
केवल प्यार नहीं, सही और गलत के बीच फर्क समझाने वाला अनुशासन भी चाहिए।
और सबसे जरूरी—उन्हें यह विश्वास चाहिए कि परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, उनके माता-पिता उनके साथ खड़े हैं और जिंदगी हर समस्या से बड़ी है।
हमें यह समझना होगा कि एक फोन, एक ब्रांड, एक महंगी वस्तु या किसी दूसरे से आगे निकलने की चाहत इंसान की जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती।
आज जरूरत बच्चों को दोष देने की नहीं, बल्कि उन्हें समझने की है। जरूरत माता-पिता को दोष देने की नहीं, बल्कि परिवार में संवाद बढ़ाने की है। जरूरत समाज को दोष देने की नहीं, बल्कि अपनी सोच पर भी विचार करने की है।
क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि “हम बच्चों को नहीं समझ पा रहे या बच्चे हमें?”
सवाल यह भी है कि हम सब मिलकर अपने बच्चों को कैसी दुनिया, कैसी सोच और कैसी जिंदगी की समझ दे रहे हैं?
क्योंकि आखिर में हर चीज से ऊपर है—जिंदगी।
अनुराधा विशाल देशमुख
भैंसदेही, मध्यप्रदेश
हम बच्चों को नहीं समझ पा रहे या बच्चे हमें?
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