पंडित राजा रूपौलिहा
₹154 करोड़ का फ्लाईओवर… फिर ₹4.69 करोड़ का खर्च! मेंटेनेंस टेंडर ने खड़े किए बड़े सवाल
भोपाल। राजधानी के डॉ. आंबेडकर सेतु (G.G. फ्लाईओवर) को लेकर सरकारी खर्च और निर्माण व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल उठ खड़े हुए हैं। करीब ₹154 करोड़ की लागत से तैयार हुए इस फ्लाईओवर की मेंटेनेंस व्यवस्था के लिए करीब ₹4.69 करोड़ का नया टेंडर सामने आने के बाद यह मुद्दा चर्चा में है।
विवाद की जड़ यह है कि निर्माण के बाद सामने आई कमियों को ठीक करने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी? यदि ये कमियां निर्माण एजेंसी के दायित्व से जुड़ी थीं, तो उनके सुधार के लिए सरकारी खजाने से अलग राशि खर्च करने की जरूरत क्यों पड़ी?
मामला न्यायालय तक पहुंचा और सुनवाई के दौरान अदालत की सख्ती के बाद इस टेंडर पर रोक लगाए जाने की जानकारी सामने आई। इसके बाद सरकारी निर्माण कार्यों की निगरानी और ठेकेदारों की जवाबदेही को लेकर बहस और तेज हो गई है।
एक फ्लाईओवर, कई सवाल
सरकार विकास परियोजनाओं पर करोड़ों रुपये खर्च करती है, लेकिन असली कसौटी निर्माण पूरा होने के बाद शुरू होती है। सवाल यह है कि करोड़ों की लागत से बनी परियोजना में यदि जल्द ही कमियां सामने आती हैं, तो उसका आर्थिक बोझ किस पर पड़ेगा?
क्या निर्माण के समय गुणवत्ता की पर्याप्त जांच हुई थी?
क्या जिम्मेदार एजेंसी से खामियां दुरुस्त कराने की प्रक्रिया अपनाई गई?
और यदि सरकारी धन से दोबारा भुगतान की नौबत आई, तो इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना जरूरी है।
जनता के पैसे का हिसाब कौन देगा?
₹154 करोड़ की परियोजना के बाद ₹4.69 करोड़ के अतिरिक्त मेंटेनेंस प्रस्ताव ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि सरकारी निर्माण कार्यों में जवाबदेही और गुणवत्ता की निगरानी कितनी प्रभावी है।
मामले में टेंडर पर न्यायालय की रोक ने भी इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर बना दिया है। अब जरूरत सिर्फ टेंडर की प्रक्रिया देखने की नहीं, बल्कि यह जांचने की है कि फ्लाईओवर में कमियां क्यों आईं, उन्हें दूर करने की जिम्मेदारी किसकी थी और सरकारी धन पर अतिरिक्त बोझ की स्थिति क्यों बनी।
विकास के नाम पर खर्च होने वाला पैसा जनता का है। इसलिए हर करोड़ का हिसाब और हर जिम्मेदार व्यक्ति की जवाबदेही तय होना जरूरी है।


