विशेष रिपोर्ट: अपराध के इतिहास में ज़हर, चाकू या बंदूक से हत्या की अनगिनत वारदातें दर्ज हैं, लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि किसी की हत्या के लिए बाकायदा लैब से घातक महामारी का बैक्टीरिया चुराया गया हो? आज से करीब 93 साल पहले, ब्रिटिश भारत की तत्कालीन राजधानी कलकत्ता (अब कोलकाता) में एक ऐसा ही सनसनीखेज मामला सामने आया था, जिसे दुनिया के शुरुआती ‘बायोलॉजिकल टेररिज्म’ (जैविक अपराध) के मामलों में गिना जाता है। इस ऐतिहासिक और खौफनाक वारदात को इतिहास में ‘कलकत्ता जर्म मर्डर केस 1933’ के नाम से जाना जाता है।
हावड़ा स्टेशन पर लिखी गई साज़िश की भूमिका
घटना 26 नवंबर 1933 की शाम की है। पाकुर रियासत (वर्तमान में झारखंड का हिस्सा) के जमींदार परिवार के युवा वारिस, 22 वर्षीय अमरेंद्र चंद्र पांडे अपने परिजनों के साथ हावड़ा रेलवे स्टेशन पर ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। स्टेशन पर यात्रियों की भारी भीड़ थी। इसी गहमागहमी के बीच, खादी वस्त्र पहने एक अज्ञात नाटा व्यक्ति अत्यंत संदेहास्पद तरीके से अमरेंद्र से टकराया और पलक झपकते ही भीड़ में ओझल हो गया।
टक्कर लगते ही अमरेंद्र को अपनी दाहिनी बांह में एक तीखी चुभन महसूस हुई। जब उन्होंने देखा, तो उनके कुर्ते पर एक सूक्ष्म छिद्र था और त्वचा से रक्त की एक बूंद टपक रही थी। सहयात्रियों और रिश्तेदारों ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए यात्रा निरस्त कर तुरंत चिकित्सीय परामर्श लेने का आग्रह किया, परंतु अमरेंद्र ने इसे एक साधारण दुर्घटना मानकर टाल दिया और पाकुर के लिए प्रस्थान कर गए। यही भूल उनके लिए जानलेवा साबित हुई।
संपत्ति विवाद और सौतेले भाई का आपराधिक षड्यंत्र
इस हत्याकांड की पृष्ठभूमि पाकुर रियासत के आंतरिक संपत्ति विवाद से जुड़ी थी। अमरेंद्र के वयस्क होने के कारण विशाल पैतृक संपत्ति का दो बराबर भागों में विभाजन होना निश्चित था। अमरेंद्र का सौतेला भाई, बिनॉयेंद्र चंद्र पांडे, जो अत्यंत विलासी और अनैतिक प्रवृत्तियों का व्यक्ति था, पूरी संपत्ति पर एकाधिकार चाहता था।
अमरेंद्र को मार्ग से हटाने के लिए बिनॉयेंद्र ने पूर्व में भी ज़हरीली चाय और विषाक्त जूतों के माध्यम से हत्या के असफल प्रयास किए थे। पारंपरिक हथियारों से हत्या करने पर पुलिसिया कार्रवाई का सीधा संदेह खुद पर आने के डर से, बिनॉयेंद्र ने एक अभूतपूर्व और अदृश्य तरीका चुनने का निर्णय लिया। इसके लिए उसने कलकत्ता के एक एलोपैथिक चिकित्सक डॉ. तारानाथ भट्टाचार्य के साथ मिलकर एक घातक चिकित्सा षड्यंत्र रचा।
बॉम्बे की लैब्स से ‘प्लेग बैक्टीरिया’ की चोरी
उन दिनों भारत में ‘प्लेग’ (Plague) महामारी का भयंकर प्रकोप था। इस बीमारी के जिम्मेदार बैक्टीरिया ‘येरसिनिया पेस्टिस’ (Yersinia pestis) के संपर्क में आने वाले व्यक्ति की मृत्यु अत्यंत कष्टदायक होती थी। चूंकि कलकत्ता शहर में पिछले तीन वर्षों से प्लेग का एक भी मामला सामने नहीं आया था, इसलिए बिनॉयेंद्र का मानना था कि प्लेग से होने वाली मृत्यु को चिकित्सा जगत एक प्राकृतिक संक्रामक रोग मानेगा और कोई संदेह नहीं करेगा।
डॉ. तारानाथ ने बॉम्बे (मुंबई) के प्रतिष्ठित ‘हाफकिन इंस्टीट्यूट’ से शोध कार्य के बहाने प्लेग के लाइव कल्चर (जीवित जीवाणु) प्राप्त करने का प्रयास किया, लेकिन संस्थान द्वारा अनुमति न मिलने पर बिनॉयेंद्र स्वयं बॉम्बे गया। उसने अपने रसूख और धनबल का दुरुपयोग कर आर्थर रोड संक्रामक रोग अस्पताल की प्रयोगशाला से प्लेग के घातक बैक्टीरिया का सैंपल अवैध रूप से प्राप्त कर लिया। इस जानलेवा सैंपल को थर्मस और आइस बॉक्स में छिपाकर ‘कालका मेल’ ट्रेन के माध्यम से कलकत्ता लाया गया।
चिकित्सीय रहस्य और पीड़ित की दर्दनाक मृत्यु
हावड़ा स्टेशन की घटना के ठीक तीन दिन बाद, अमरेंद्र की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। उन्हें अत्यधिक तीव्र ज्वर आया, बगल (Axilla) में गंभीर सूजन (गिल्टियां) उभर आईं और फेफड़ों में संक्रमण (Pneumonic symptoms) फैल गया। डॉक्टरों की पूरी टीम उनके इलाज में जुट गई, लेकिन तत्कालीन चिकित्सा विज्ञान कलकत्ता के एक धनाढ्य क्षेत्र में रहने वाले युवक में प्लेग के लक्षणों को समझने में असमर्थ रहा।
अंततः, घटना के मात्र आठ दिन बाद 4 दिसंबर 1933 को अमरेंद्र कोमा में चले गए और उनकी मृत्यु हो गई। प्रारंभिक डेथ सर्टिफिकेट में डॉक्टरों ने मृत्यु का कारण ‘गंभीर निमोनिया’ दर्ज किया। बिनॉयेंद्र का षड्यंत्र पूरी तरह सफल होता दिख रहा था। अमरेंद्र के अंतिम संस्कार के तत्काल बाद उसने पाकुर रियासत के बैंक खातों का संचालन अपने हाथ में ले लिया।
कलकत्ता पुलिस की वैज्ञानिक तफ्तीश
अमरेंद्र के सगे मातृपक्ष के रिश्तेदारों को बिनॉयेंद्र की गतिविधियों पर गहरा संदेह था। उनके निरंतर दबाव के बाद, कलकत्ता पुलिस की इंटेलिजेंस विंग के कुशल इंस्पेक्टर शरत चंद्र मित्रा को मामले की प्रारंभिक जांच सौंपी गई।
इंस्पेक्टर मित्रा ने दूरदर्शिता दिखाते हुए अमरेंद्र की मृत्यु से पूर्व लिए गए रक्त के नमूनों को सुरक्षित रखवाया और उन्हें पुनः विस्तृत परीक्षण के लिए कलकत्ता के स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन भेजा। जब तीन स्वतंत्र चिकित्सा विशेषज्ञों की रिपोर्ट आई, तो ब्रिटिश प्रशासन में हड़कंप मच गया। रिपोर्ट ने आधिकारिक पुष्टि की कि अमरेंद्र की मृत्यु प्राकृतिक नहीं थी, बल्कि उनके रक्त में ‘प्लेग’ के जीवित बैक्टीरिया पाए गए थे।
इसके बाद कलकत्ता पुलिस ने देशव्यापी स्तर पर कड़ियों को जोड़ना शुरू किया:
- पुलिस की एक विशेष टीम बॉम्बे भेजी गई, जिसने उन होटलों के रिकॉर्ड जब्त किए जहाँ बिनॉयेंद्र छद्म नाम से रुका था।
- आर्थर रोड अस्पताल के प्रयोगशाला सहायकों से पूछताछ की गई, जिन्होंने बिनॉयेंद्र को प्लेग के सैंपल सौंपने की बात स्वीकार की।
- बिनॉयेंद्र द्वारा डॉ. तारानाथ को किए गए गुप्त भुगतानों और टेलीग्रामों को साक्ष्य के रूप में एकत्र किया गया।
ऐतिहासिक मुकदमा और अनसुलझा रहस्य
फरवरी 1934 में, जब बिनॉयेंद्र आसनसोल रेलवे स्टेशन से छिपकर भागने का प्रयास कर रहा था, पुलिस ने उसे सह-आरोपी डॉ. तारानाथ भट्टाचार्य के साथ गिरफ्तार कर लिया।
यह ऐतिहासिक मुकदमा लगभग नौ महीनों तक चला। यह कानूनी इतिहास का पहला ऐसा अभूतपूर्व मामला था जहाँ अभियोजन पक्ष (Prosecution) को बिना किसी प्रत्यक्ष गवाह या पारंपरिक हथियार के, विशुद्ध रूप से वैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) के आधार पर मर्डर साबित करना था। इस मुकदमे की रिपोर्टिंग लंदन के ‘द टाइम्स’ और अमेरिका के प्रमुख समाचार पत्रों में प्रमुखता से हुई।
साल 1936 में, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने बिनॉयेंद्र चंद्र पांडे और डॉ. तारानाथ भट्टाचार्य को भारतीय दंड संहिता के तहत हत्या के इस जघन्य षड्यंत्र का दोषी पाया। दोनों अपराधियों को अंडमान की सेल्युलर जेल (‘काला पानी’) में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
आज भी अनुत्तरित है एक प्रश्न…
न्यायालय ने मुख्य साजिशकर्ताओं को तो सलाखों के पीछे भेज दिया, लेकिन हावड़ा स्टेशन की उस भारी भीड़ में अमरेंद्र को ज़हरीली सुई चुभाने वाला वो नाटा शूटर कौन था? पुलिस तमाम प्रयासों के बाद भी उस भाड़े के हत्यारे (Contract Killer) की पहचान नहीं कर सकी। वह रहस्यमयी हमलावर इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए एक ‘अदृश्य परछाई’ बनकर रह गया।


