Explore the website

Looking for something?

Sunday, January 18, 2026

Enjoy the benefits of exclusive reading

TOP NEWS

संस्कार पब्लिक हाई स्कूल...

शहपुरा ,,संस्कार पब्लिक स्कूल शहपुरा के विद्यार्थियों को प्रति वर्ष अनुसार शैक्षणिक भ्रमण...

मकर संक्रांति पर अनाथ...

आज दिनांक 15 जनवरी 2026 को कलेक्टर महोदया श्रीमती अंजू पवन भदौरिया के...

छोटे शहर से बड़ा...

छोटे शहर से बड़ा नेतृत्व: भाजपा के युवा नेता मोहित कुमार पांचाल बने...

विदिशा : आठ पुलिस...

विदिशा की चर्चित अरिहंत ज्वैलर्स डकैती कांड का खुलासा, पुलिस ने दो नाबालिग...
Homeमध्य प्रदेशJHABUA : भगोरिया की मस्ती में डूबा आदिवासी अंचल, लगे परंपरा के...

JHABUA : भगोरिया की मस्ती में डूबा आदिवासी अंचल, लगे परंपरा के मेले… देखिए तस्वीरें

भगोरिया में पारंपरिक वेशभूषा में पहुंची युवतियां।

भगोरिया मेला मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मेला आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करता है। भगोरिया मेले में ग्रामीण पारंपरिक नृत्य, संगीत और स्थानीय भोजन का आनंद ले रहे हैं। यह मेला हर साल होली से पहले आयोजित किया जाता है।

आदिवासी अंचल में प्रमुख सांस्कृतिक पर्व भगोरियों मेलों की शुरुआत शुक्रवार से हो गई। अब 13 मार्च तक अंचल सांस्कृतिक उत्सव के उल्लास में डूबा रहेगा। पहले दिन झाबुआ-आलीराजपुर जिले के वालपुर, कट्ठीवाड़ा, उदयगढ़, बड़ी, भगोर, बेकल्दा, मांडली व कालीदेवी में मेले लगे।

हजारों की संख्या में लोग इनमें मांदल की थाप और बांसुरी की धुन पर पारंपरिक नृत्य करते हुए निकले। युवतियां भी पारंपरिक गेर भगोरिया का सबसे बड़ा आकर्षण रही। बड़ी संख्या में बाहर से भी लोग भगोरिया उत्सव में शामिल होने के लिए आए।

शनिवार को झाबुआ-आलीराजपुर जिले में नानपुर, उमराली, राणापुर, मेघनगर, बामनिया, झकनावदा व बलेड़ी में भगोरिया मेला लगेगा। इसके अलावा धार, बड़वानी, खरगोन, खंडवा में भी मेलों की धूम रहेगी। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के एक दिन पूर्व शुरू हुए मेलों में आधुनिकता भी दिखी।

ये भी जानें

भगोरिया को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। वरिष्ठ लेखक आरएस त्रिवेदी ने बताया कि भगोर नामक गांव माताजी के श्राप से उजड़ गया था जो बाद में वापस बसा। इस खुशी में वहां वार्षिक मेला आयोजित किया गया।

बाद में इस तरह के मेले अन्य कस्बों में भी लगने लगे, चूंकि यह परंपरा भगोर की तर्ज पर शुरू हुई थी, इसलिए इसका नाम भगोरिया पड़ गया। एक अन्य प्रथा के अनुसार होली के सात दिन पहले आने वाले हाट प्राचीनकाल में गुलालिया हाट कहे जाते थे।

भगोरिया हाट कहने लगे

गुलालिया हाट ही बाद में भगोरिया हाट कहे जाने लगे। सभी ग्रामीण हाट बाजार स्थल पर ही एकत्रित हो जाते। गुलाल उड़ती और उल्लास भरा वातावरण छा जाता।

oppo_2

रियासत काल में राजा व जागीरदार भी इसमें शामिल होते थे। वे होली की गोट यानी पुरस्कार स्वरूप कुछ नगदी व वस्तु अपनी प्रजा के बीच बांटते थे। अब यह भूमिका जन प्रतिनिधियों के हिस्से में आ गई है।

नारायण शर्मा
एन टी वी टाइम न्यूज में मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़ के लिए काम करता हूं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Exit mobile version