Sunday, September 13, 2026

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Shri Krishna Janmashtami 2026: जानें जन्माष्टमी का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस बार का विशेष संयोग

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष: क्यों मनाई जाती है जन्माष्टमी, क्या है शुभ मुहूर्त और इस बार की खास मान्यताएं

विशेष रिपोर्ट:
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को देश-दुनिया में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार बेहद धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के आठवें अवतार, मर्यादा पुरुषोत्तम और लीलाधर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। कान्हा का जन्मोत्सव हर साल न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी एक बड़ा उत्सव बनकर उभरता है।

क्यों मनाई जाती है जन्माष्टमी? (The Significance)
द्वापर युग में जब कंस का अत्याचार चरम पर पहुंच गया था, तब धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश के लिए रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को भगवान श्रीकृष्ण ने मथुरा के कारागार में माता देवकी और वासुदेव के आठवें पुत्र के रूप में जन्म लिया था। गीता के माध्यम से कर्म का संदेश देने वाले कन्हा के इसी प्राकट्य दिवस को मनाने के लिए हर साल जन्माष्टमी मनाई जाती है।

इस वर्ष का शुभ मुहूर्त (Auspicious Timing)
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस वर्ष भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को भगवान के स्वागत के लिए विशेष संयोग बन रहे हैं।

  • अष्टमी तिथि की शुरुआत: आधी रात से पहले ही पूजा के विशेष योग शुरू हो जाएंगे।
  • निशीथ काल (पूजा का मुख्य समय): रात्रि 12:00 बजे से लेकर 12:45 बजे तक का समय बाल-गोपाल के जन्म और अभिषेक के लिए सबसे उत्तम माना गया है।
    इस दौरान रोहिणी नक्षत्र का संयोग बनने से व्रत और पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है।

कैसे की जाती है पूजा और व्रत? (Rituals and Traditions)
जन्माष्टमी के दिन श्रद्धालु दिनभर उपवास रखते हैं और भगवान के भजन-कीर्तन में लीन रहते हैं।

  • पंचामृत अभिषेक: रात के 12 बजते ही शंख ध्वनि और ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के जयकारों के साथ कान्हा का जन्म कराया जाता है। इसके बाद उन्हें दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल (पंचामृत) से स्नान कराया जाता है।
  • विशेष भोग: बाल-गोपाल को माखन-मिश्री, धनिया की पंजीरी, और छप्पन भोग अर्पित किए जाते हैं।
  • पालना झुलाना: पूजा के बाद कन्हा को नए वस्त्र और मोरपंख का मुकुट पहनाकर पालने में झुलाया जाता है, जिसके बाद प्रसाद वितरण होता है।

देश भर में धूम: मथुरा-वृंदावन से लेकर दही-हांडी तक (The Celebrations)

  • मथुरा और वृंदावन: भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा और लीलाभूमि वृंदावन में इस दिन पैर रखने की जगह नहीं होती। बांके बिहारी मंदिर और इस्कॉन (ISKCON) मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाता है।
  • दही-हांडी उत्सव: महाराष्ट्र और देश के अन्य हिस्सों में जन्माष्टमी के अगले दिन ‘दही-हांडी’ या ‘गोविंदा उत्सव’ का आयोजन होता है। इसमें युवाओं की टोलियां हवा में लटकी माखन की मटकी को फोड़ने के लिए इंसानी मीनार (Human Pyramid) बनाती हैं, जो कान्हा की बाल-लीलाओं की याद दिलाता है।

जीवन का सबसे बड़ा संदेश: कर्मयोग (The Message)
जन्माष्टमी सिर्फ व्रत और पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भगवान श्रीकृष्ण के दिए गए उन उपदेशों को याद करने का दिन है जो उन्होंने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को दिए थे। उनका ‘कर्मयोग’ का सिद्धांत आज के आधुनिक जीवन में भी उतना ही प्रासंगिक है, जो हमें सिखाता है कि फल की चिंता किए बिना सही दिशा में मेहनत करते रहना चाहिए।

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