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MP: पांढुर्णा में शुरू हुआ 400 साल पुराना खूनी खेल ‘गोटमार’; इतिहास की अधूरी प्रेम कहानी के लिए आज फिर बरस रहे पत्थर, 700 पुलिसकर्मी तैनात

MP: पांढुर्णा में खूनी खेल ‘गोटमार’ शुरू; 700 पुलिसकर्मी मुस्तैद, 3 ड्रोन और 10 CCTV से रखी जा रही है पैनी नजर

पांढुर्णा (NTV TIME): मध्य प्रदेश के पांढुर्णा जिले में आज परंपरा, रोमांच और आस्था के नाम पर खेला जाने वाला सदियों पुराना और दुनिया का सबसे अनोखा व विवादित ‘गोटमार मेला’ शुरू हो चुका है। जाम नदी के दोनों तट युद्ध के मैदान में तब्दील हो चुके हैं, जहाँ एक तरफ पांढुर्णा और दूसरी तरफ सावरगांव के हजारों लोग आमने-सामने हैं। आसमान से बरसते पत्थरों के बीच इस खतरनाक खेल की शुरुआत हो चुकी है। भारी पथराव और किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए जिला प्रशासन, पुलिस और स्वास्थ्य विभाग ने सुरक्षा के कड़े और अभूतपूर्व बंदोबस्त किए हैं।

सुरक्षा के हाई-टेक इंतजाम: ड्रोन और CCTV से चप्पे-चप्पे पर नजर

मेले में कानून व्यवस्था बनाए रखने और हिंसा को एक सीमित दायरे में रखने के लिए इस बार पांढुर्णा जिला प्रशासन बेहद सख्त नजर आ रहा है।

  • 700+ जवानों का कड़ा पहरा: पूरे मेला क्षेत्र, जाम नदी के तटों और संवेदनशील पॉइंट्स पर 700 से अधिक पुलिस अधिकारियों और जवानों की तैनाती की गई है। इसमें विशेष सशस्त्र बल (SAF) की टुकड़ियां भी शामिल हैं।
  • आसमान से निगरानी: असामाजिक तत्वों और उपद्रवियों पर नजर रखने के लिए 3 हाई-टेक ड्रोन कैमरों के जरिए आसमान से पल-पल की लाइव वीडियो रिकॉर्डिंग की जा रही है।
  • तीसरी आंख का पहरा: मेला ग्राउंड और नदी के एंट्री पॉइंट्स पर 10 हाई-डेफिनिशन (HD) CCTV कैमरे लगाए गए हैं, जिनका कंट्रोल रूम सीधे जिला पुलिस मुख्यालय से जोड़ा गया है।
  • गोफन पर पूर्ण प्रतिबंध: पत्थर फेंकने की गति और दूरी बढ़ाने वाले पारंपरिक हथियार ‘गोफन’ (Slingshot) के इस्तेमाल पर प्रशासन ने पूरी तरह प्रतिबंध लगाया है। यदि कोई गोफन से पत्थर मारता पाया गया, तो उस पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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मैदान में मेडिकल आर्मी: 44 डॉक्टर और 22 एंबुलेंस अलर्ट मोड पर

गोटमार मेले का इतिहास गवाह है कि इस खेल में हर साल सैकड़ों खिलाड़ी और दर्शक लहूलुहान होते हैं। गंभीर चोटों और इमरजेंसी से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने मेला क्षेत्र को एक तरह से ‘अस्पताल’ में तब्दील कर दिया है:

  • 44 डॉक्टरों की ड्यूटी: मेला स्थल पर बनाए गए अस्थाई मेडिकल कैंप्स और जिला अस्पताल में कुल 44 अनुभवी डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की तैनाती की गई है, जो प्राथमिक उपचार से लेकर सर्जरी तक के लिए तैयार हैं।
  • 22 एंबुलेंस का काफिला: जाम नदी के दोनों किनारों और संपर्क मार्गों पर 22 एंबुलेंस (108 और प्राइवेट) को अलर्ट मोड पर खड़ा किया गया है, ताकि गंभीर रूप से घायलों को बिना समय गंवाए तुरंत बड़े अस्पतालों (नागपुर या छिंदवाड़ा) रेफर किया जा सके।
  • नदी पर बैरिकेडिंग: हालिया बारिश के बाद जाम नदी के जलस्तर को देखते हुए गोताखोरों की टीम तैनात है और लोहे की मजबूत रेलिंग (बैरिकेडिंग) लगाई गई है ताकि कोई पानी के तेज बहाव में न बहे।

क्या है गोटमार का इतिहास?

क्यों एक-दूसरे के खून के प्यासे बनते हैं दो गांव?’गोटमार’ का शाब्दिक अर्थ है ‘गोटा मारना’ यानी पत्थर मारना। यह प्रथा करीब 300 से 400 साल पुरानी बताई जाती है। हर साल भाद्रपद मास की अमावस्या (पोला त्योहार के अगले दिन) को आयोजित होने वाले इस मेले के पीछे दो मुख्य ऐतिहासिक और पौराणिक कहानियां प्रचलित हैं:

1. एक अधूरी प्रेम कहानी का खूनी अंत (सबसे लोकप्रिय लोकमान्यता)स्थानीय बुजुर्गों और लोककथाओं के अनुसार,

सदियों पहले पांढुर्णा के एक गरीब युवक को जाम नदी के पार बसे सावरगांव की एक खूबसूरत युवती से प्रेम हो गया था। दोनों गांवों के बीच पुरानी रंजिश थी, इसलिए परिवार इस रिश्ते के खिलाफ थे। एक दिन वह युवक सावरगांव गया और लड़की को भगाकर अपने साथ पांढुर्णा लाने लगा।जब वे दोनों जाम नदी के बीचों-बीच पहुंचे, तो सावरगांव के लोगों ने उन्हें देख लिया और अपनी लड़की को वापस छीनने के लिए उन पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। अपने गांव के लड़के को बचाने के लिए पांढुर्णा के लोग भी नदी किनारे आ गए और उन्होंने जवाबी पथराव शुरू कर दिया। दोनों तरफ से हो रही पत्थरों की भीषण और खूनी बारिश के बीच नदी की धार में ही उस बेकसूर प्रेमी जोड़े की दबकर मौत हो गई। इस दुखद अंत के बाद दोनों गांवों के लोगों को अपनी गलती का अहसास हुआ। तब से उन अमर प्रेमियों की याद में इस अनूठी परंपरा की शुरुआत हुई।

2. राजा जाटबा और पिंडारियों की शौर्य गाथा (ऐतिहासिक मत)एक अन्य ऐतिहासिक मत के अनुसार, जाम नदी के किनारे कभी पिंडारियों का एक प्राचीन और अभेद्य किला था, जिसके सेनापति दलपत शाह (गोंड राजा जाटबा नरेश) थे। जब नागपुर के भोसले राजा की विशाल सेना ने इस किले पर अचानक हमला किया, तो पिंडारियों के पारंपरिक अस्त्र-शस्त्र खत्म हो गए। तब सेना और स्थानीय नागरिकों ने किले के ऊपर से भोसले राजा की सेना पर पत्थरों (गोटों) की भारी बौछार कर उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया और अपनी मातृभूमि की रक्षा की। इस ऐतिहासिक जीत के उपलक्ष्य में भी इस खेल को शौर्य के प्रतीक के रूप में खेला जाता है।

कैसे खेला जाता है यह खतरनाक खेल? क्या है नियम?

  • झंडा गाड़ना: परंपरा के अनुसार, मेले के एक दिन पहले सावरगांव के लोग जंगल से पलाश (टेसू) के पेड़ की एक मजबूत और लंबी डाल लाते हैं और उसे जाम नदी के ठीक बीचों-बीच एक झंडे के रूप में गाड़ देते हैं। इस झंडे के ऊपर एक नारियल और चंडिका माता का प्रतीक कपड़ा बांधा जाता है।
  • शुरू होता है खूनी संघर्ष: नदी के एक तरफ पांढुर्णा की सेना (खिलाड़ी) और दूसरी तरफ सावरगांव की सेना जुटती है। पांढुर्णा के जांबाज खिलाड़ी पत्थरों की बौछार के बीच रेंगते हुए नदी में उतरकर उस झंडे को काटने या हासिल करने का प्रयास करते हैं, जबकि सावरगांव के लोग पत्थरों की दीवार खड़ी कर उन्हें रोकने की कोशिश करते हैं।
  • चंडिका माता के दरबार में सुखद अंत: जब पांढुर्णा के खिलाड़ी झंडा तोड़ लेते हैं या शाम ढलने पर दोनों पक्षों में आपसी सहमति बनती है, तो खेल समाप्त घोषित होता है। इसके तुरंत बाद, दोनों गांवों के लोग सारे गिले-शिकवे भूलकर, एक साथ मां चंडिका के ऐतिहासिक मंदिर में जाते हैं। वहाँ वे एक-दूसरे के घावों पर हल्दी-चंदन का लेप लगाते हैं, गले मिलते हैं और अगले साल फिर मिलने के वादे के साथ विदा होते हैं।

मानवाधिकार आयोग, हाई कोर्ट और प्रशासन द्वारा पत्थरों की जगह रबर की गेंदों या फूलों का इस्तेमाल करने की कई कोशिशें की गईं और धारा 144 भी लगाई गई, लेकिन स्थानीय लोगों की पारंपरिक आस्था और जिद के आगे कानून को हमेशा पीछे हटना पड़ा और यह खूनी खेल आज भी बदस्तूर जारी है।


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