सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: हिरासत के बाद 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेशी जरूरी; देरी होने पर आरोपी को तुरंत रिहा करना होगा
नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवाधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि अगर पुलिस या कोई भी जांच एजेंसी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार या हिरासत में लेती है, तो उसे 24 घंटे के भीतर नजदीकी मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। अगर इस तय समय सीमा में आरोपी की कोर्ट में पेशी नहीं होती है, तो उस व्यक्ति की हिरासत को अवैध माना जाएगा और उसे तुरंत रिहा करना होगा।
अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत मिला यह अधिकार पूर्ण (Absolute) है और पुलिस किसी भी बहाने से इसका उल्लंघन नहीं कर सकती।
इस फैसले से जुड़े 5 बड़े सवाल और उनके जवाब
आम जनता और कानून व्यवस्था से जुड़े इस बड़े फैसले को आसान भाषा में समझने के लिए पढ़ें ये 5 जरूरी सवाल-जवाब:
सवाल 1: सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य रूप से क्या कहा है?
जवाब: सुप्रीम कोर्ट ने कानून के नियम को कड़ा करते हुए कहा कि किसी भी नागरिक को बिना कानूनी प्रक्रिया के एक मिनट भी हिरासत में नहीं रखा जा सकता। गिरफ्तारी के समय से ठीक 24 घंटे के भीतर उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना ही होगा। अगर पुलिस इस समय सीमा को पार करती है और मजिस्ट्रेट से उसकी कस्टडी (रिमांड) नहीं लेती, तो 24 घंटे पूरे होते ही पुलिस को उस व्यक्ति को छोड़ना पड़ेगा। देरी होने की स्थिति में आरोपी को तुरंत रिहाई का अधिकार मिल जाता है।
सवाल 2: क्या 24 घंटे की इस अवधि में ‘यात्रा का समय’ (Travel Time) भी शामिल है?
जवाब: कानून के मुताबिक, गिरफ्तारी के स्थान से लेकर मजिस्ट्रेट की अदालत तक जाने में जो ‘जरूरी यात्रा का समय’ (Travel Time) लगता है, उसे इन 24 घंटों में से घटा दिया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि पुलिस किसी को दूरदराज के इलाके से गिरफ्तार करती है और कोर्ट लाने में 3 घंटे का समय लगता है, तो पुलिस के पास कार्रवाई के लिए कुल 24 + 3 = 27 घंटे होंगे। लेकिन यात्रा के नाम पर बेवजह की देरी को अदालत में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सवाल 3: क्या यह नियम शनिवार, रविवार या सरकारी छुट्टी के दिन भी लागू होता है?
जवाब: हाँ, यह नियम हर दिन लागू होता है। छुट्टियां होने पर भी पुलिस 24 घंटे से ज्यादा किसी को थाने में बंद नहीं रख सकती। ऐसी स्थिति में पुलिस को आरोपी को मजिस्ट्रेट के सरकारी आवास (रिहायशी बंगले) पर ले जाकर पेश करना होता है। हर क्षेत्र में छुट्टियों के दिन के लिए ‘ड्यूटी मजिस्ट्रेट’ तैनात होते हैं, जो रिमांड या जमानत पर फैसला लेते हैं।
सवाल 4: अगर पुलिस 24 घंटे में पेश नहीं करती, तो आरोपी या उसके परिवार के पास क्या कानूनी रास्ता है?
जवाब: अगर पुलिस किसी व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक समय तक अवैध हिरासत में रखती है, तो उसके परिवार वाले तुरंत हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ (Habeas Corpus) याचिका दायर कर सकते हैं। इसके अलावा, वकील के माध्यम से सीधे मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। ऐसी स्थिति में कोर्ट पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई का आदेश दे सकता है।
सवाल 5: सुप्रीम कोर्ट को यह सख्त रुख क्यों अपनाना पड़ा? इसके क्या मायने हैं?
जवाब: अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं जहाँ पुलिस किसी आरोपी को पूछताछ के नाम पर कई दिनों तक अवैध तरीके से थाने में बैठाए रखती है और कागजों पर गिरफ्तारी काफी बाद में दिखाती है। सुप्रीम कोर्ट ने इस “अवैध कस्टडी” के चलन और पुलिसिया बर्बरता (Custodial Violence) पर लगाम लगाने के लिए यह सख्त रुख अपनाया है। यह फैसला देश के हर नागरिक को पुलिस के दुरुपयोग से सुरक्षा देता है और कानून व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करता है।


