धार्मिक नगरी उज्जैन इस समय एक बार फिर देश भर में गहरी आस्था और उत्सुकता का केंद्र बन चुकी है। सिंहस्थ महाकुंभ 2028 की तैयारियों के तहत शहर के बड़ा सराफा (सती गेट) मार्ग पर चल रहे सड़क चौड़ीकरण प्रोजेक्ट के बीच, यहां स्थापित ‘खड़े हनुमान जी’ की प्रतिमा को लेकर सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक भारी हलचल देखी जा रही है।
दावा किया जा रहा है कि सोशल मीडिया पर वायरल हो रही रील्स को देखकर पिछले कुछ ही दिनों में 8,000 से अधिक श्रद्धालु भगवान के दर्शन के लिए उज्जैन पहुंच चुके हैं। स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए प्रशासन ने मंदिर के आसपास बैरिकेडिंग कर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया है।
सोशल मीडिया पर क्या है दावा? क्यों आ रहे हैं दूसरे राज्यों से लोग?
इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कुछ वीडियो और रील्स तेजी से ट्रेंड कर रहे हैं। इन वीडियोज में दावा किया जा रहा है कि विकास कार्य के लिए मंदिर के शिखर और बाहरी ढांचे को तो हटा दिया गया, लेकिन जब लगभग 8 फीट ऊंची इस प्राचीन हनुमान प्रतिमा को विस्थापित करने की कोशिश की गई, तो बड़ी से बड़ी मशीनें और क्रेन भी इसे एक इंच नहीं हिला सकीं।
इन दावों के वायरल होने के बाद न सिर्फ मध्य प्रदेश, बल्कि राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु उज्जैन पहुंच रहे हैं। भक्त खुले आसमान के नीचे अस्थायी शेड में विराजे बजरंगबली के सामने भजन-कीर्तन कर रहे हैं और रील्स बना रहे हैं।
उज्जैन प्रशासन का बड़ा बयान: ‘हटाने का प्रयास ही नहीं किया’
इस पूरे घटनाक्रम पर मचे बवाल के बीच उज्जैन जिला प्रशासन और नगर निगम ने अपना आधिकारिक रुख साफ किया है। प्रशासनिक अधिकारियों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि “प्रतिमा को बलपूर्वक या क्रेन से हटाने का कोई भी प्रयास नहीं किया गया है।”
अधिकारियों का कहना है कि सिंहस्थ 2028 के मद्देनजर यातायात को सुगम बनाने के लिए सड़कों को चौड़ा करना अनिवार्य है, लेकिन प्रशासन किसी भी धार्मिक स्थल या जनभावना को ठेस पहुंचाए बिना, पूरी सहमति और वैज्ञानिक तरीकों से ही कदम बढ़ाएगा।
चमत्कार या प्राचीन वास्तुकला? IIT इंदौर और ASI की टीम मुस्तैद
जहां श्रद्धालु इसे साक्षात प्रभु का चमत्कार मान रहे हैं, वहीं तकनीकी जानकार इसे प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना बता रहे हैं। प्राथमिक जांच के अनुसार, इस विशाल प्रतिमा का करीब 4 से 5 फीट का हिस्सा जमीन के अंदर गहराई तक धंसा हुआ है, जिसे प्राचीन ‘लॉकिंग सिस्टम’ (इंटरलॉकिंग तकनीक) से स्थापित किया गया है।
इस रहस्य से पर्दा उठाने और सुरक्षित समाधान निकालने के लिए दो बड़ी संस्थाएं काम कर रही हैं:
आगे क्या?
प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि जब तक IIT इंदौर और पुरातत्व विभाग की विशेष स्कैनिंग और तकनीकी रिपोर्ट सामने नहीं आ जाती, तब तक प्रतिमा को लेकर कोई भी कार्रवाई नहीं की जाएगी। फिलहाल, सभी पक्षों से संवाद स्थापित कर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश जारी है।
- IIT इंदौर की तकनीकी जांच: उज्जैन नगर निगम के अनुरोध पर IIT इंदौर के विशेषज्ञों की एक टीम ने आधुनिक रडार और स्कैनिंग उपकरणों के साथ मूर्ति के बेस (आधार) की जांच की है।
- ASI की एंट्री: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की टीम ने भी प्रतिमा के पत्थरों और बनावट का अध्ययन किया है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह मूर्ति सिर्फ 150-170 साल पुरानी नहीं, बल्कि राजा भोज या परमार कालीन (लगभग 1000 वर्ष पुरानी) हो सकती है।


