एक साधारण शिक्षक के घर जन्मा अनमोल रत्न
25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जब अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म हुआ, तो किसी ने नहीं सोचा था कि एक साधारण शिक्षक पंडित कृष्ण बिहारी वाजपेयी का यह बेटा एक दिन भारत का भाग्य लिखेगा। ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज से शुरुआती पढ़ाई और कानपुर के डीएवी कॉलेज से राजनीति विज्ञान में एम.ए. की डिग्री हासिल करने वाले अटल जी में नेतृत्व और सहृदयता का संगम बचपन से ही दिखने लगा था।पत्रकारिता की धार से राजनीति की बुलंदी तक
राजनीति की चकाचौंध में आने से पहले अटल जी ने अपनी लेखनी को अपना हथियार बनाया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक के रूप में उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’, ‘पांचजन्य’, ‘दैनिक स्वदेश’ और ‘वीर अर्जुन’ जैसे समाचार पत्रों का संपादन किया। उनकी पैनी सोच और ओजस्वी भाषा ने उन्हें आम जनता से सीधा जोड़ दिया। 1957 में जब वे पहली बार उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से लोकसभा पहुंचे, तो संसद में दिए उनके पहले ही भाषण पर देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कह दिया था—”यह युवक एक दिन भारत का प्रधानमंत्री बनेगा।”
पत्रकारिता की धार से राजनीति की बुलंदी तक
राजनीति की चकाचौंध में आने से पहले अटल जी ने अपनी लेखनी को अपना हथियार बनाया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक के रूप में उन्होंने ‘राष्ट्रधर्म’, ‘पांचजन्य’, ‘दैनिक स्वदेश’ और ‘वीर अर्जुन’ जैसे समाचार पत्रों का संपादन किया। उनकी पैनी सोच और ओजस्वी भाषा ने उन्हें आम जनता से सीधा जोड़ दिया। 1957 में जब वे पहली बार उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से लोकसभा पहुंचे, तो संसद में दिए उनके पहले ही भाषण पर देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कह दिया था—”यह युवक एक दिन भारत का प्रधानमंत्री बनेगा।”
विचारधारा का संकल्प और बीजेपी का उदय
1980 का दौर भारतीय राजनीति का एक नया मोड़ था। अटल बिहारी वाजपेयी और उनके साथी लालकृष्ण आडवाणी ने मिलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की स्थापना की। मुंबई के उस ऐतिहासिक अधिवेशन में अटल जी ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए कहा था—”अंधेरा छंटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा।” यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि भारतीय राजनीति के नए युग की आहट थी।
तीन बार देश की कमान और ऐतिहासिक फैसले
अटल जी ने तीन बार देश के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली—पहले 13 दिन (1996), फिर 13 महीने (1998), और फिर 1999 से 2004 तक अपना 5 साल का पूर्ण कार्यकाल। वे भारत के पहले ऐसे गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने जिन्होंने गठबंधन सरकार को स्थायित्व के साथ चलाया।
उनके फैसले भारत की शक्ति का प्रतीक बने:
पोखरन परमाणु परीक्षण (1998): अमेरिका और वैश्विक ताकतों के कड़े प्रतिबंधों की परवाह किए बिना राजस्थान के तपते रेगिस्तान में पांच सफल परमाणु धमाके कर भारत को विश्व पटल पर परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र घोषित किया।
कारगिल में पाकिस्तान को धूल चटाई (1999): शांति का हाथ बढ़ाते हुए वे बस से लाहौर गए, लेकिन जब पाकिस्तान ने पीठ में छुरा घोंपा, तो ‘ऑपरेशन विजय’ के जरिए भारतीय सेना को खुली छूट दी और कारगिल की चोटियों पर तिरंगा दोबारा फहराया।
विकास का नया दौर: देश को आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ने के लिए ‘स्वर्णिम चतुर्भुज योजना’ (Golden Quadrilateral), गांवों को पक्की सड़कों से जोड़ने के लिए ‘प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना’ और हर बच्चे की कलम तक पहुंच के लिए ‘सर्व शिक्षा अभियान’ जैसी युगांतरकारी योजनाएं दीं।
संसद की गर्जना और कोमल कवि हृदय
विरोधी भी जिनके कायल थे, वे थे अटल बिहारी वाजपेयी। 1977 में जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री रहते हुए जब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN) के मंच पर पहली बार हिंदी में भाषण दिया, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था। राजनीति के कठोर थपेड़ों के बीच भी उनका कवि हृदय हमेशा मुस्कुराता रहा। उनकी प्रसिद्ध कविता आज भी हर गिरते हुए इंसान को उठाने का हौसला देती है:
“बाधाएं आती हैं आएं,
घिरें प्रलय की घोर घटाएं,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,
निज हाथों में हंसते-हंसते,
आग लगाकर जलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा।”
भारत रत्न और सुशासन का अमर प्रतीक
देश के प्रति उनके अप्रतिम समर्पण के लिए 1992 में ‘पद्म विभूषण’ और 2015 में देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से उन्हें नवाजा गया। 16 अगस्त 2018 को दिल्ली के एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली, लेकिन उनके विचार आज भी अमर हैं। भारत सरकार हर साल उनके जन्मदिन 25 दिसंबर को ‘सुशासन दिवस’ (Good Governance Day) के रूप में मनाती है, जो इस बात का प्रमाण है कि सत्ता बदली जा सकती है, लेकिन अटल जी जैसी छाप कभी मिटाई नहीं जा सकती।


