Sunday, September 13, 2026

TOP NEWS

गंज बासौदा में आस्था...

गंज बासौदा में आस्था का महासैलाब: बाबा राजगौंड दरबार में गूंजे 'जय श्री...

जन शिक्षण संस्थान चंडीगढ़...

जन शिक्षण संस्थान चंडीगढ़ में प्रदर्शनी का आयोजन, प्रतिभागियों के कार्यों की सराहनामनोज...

धार के मुख्य बाजारों...

धार के मुख्य बाजारों में रेंगते रहे वाहन, त्योहार के समय आनंद चौपाटी...

भारतीय जनता पार्टी पिछड़ा...

भारतीय जनता पार्टी पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के धार जिला ग्रामीण प्रभारी विकास यादव...
Homeधर्मविघ्नहर्ता का आगमन: इस शुभ मुहूर्त में करें गणपति बप्पा की स्थापना,...

विघ्नहर्ता का आगमन: इस शुभ मुहूर्त में करें गणपति बप्पा की स्थापना, भूलकर भी न करें चंद्र दर्शन; पढ़ें पावन कथा

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला महापर्व गणेश चतुर्थी इस वर्ष बेहद श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की अगवानी के लिए देशभर के पंडालों से लेकर घरों तक में विशेष तैयारियां की गई हैं। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से की गई पूजा-अर्चना से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का वास होता है।

दोपहर 11:02 से दोपहर 01:31 बजे तक रहेगा स्थापना का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, भगवान गणेश का प्राकट्य दोपहर (मध्याह्न) काल में हुआ था, इसलिए उनकी मूर्ति की स्थापना और मुख्य पूजन के लिए दोपहर का समय ही शास्त्रसम्मत और सबसे उत्तम माना गया है।

  • चतुर्थी तिथि प्रारंभ: सुबह 07:06 बजे से
  • गणपति स्थापना शुभ मुहूर्त: दोपहर 11:02 बजे से दोपहर 01:31 बजे तक
  • कुल अवधि: 2 घंटे 29 मिनट
  • अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:52 बजे से 12:41 बजे तक (विशेष फलदायी)

श्रद्धालु इस तय समयावधि के बीच अपने घरों या व्यापारिक प्रतिष्ठानों की उत्तर या पूर्व दिशा में बप्पा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना कर सकते हैं। पूजा में गणपति जी को 21 दूर्वा दल (घास) और उनके प्रिय मोदक का भोग अवश्य लगाना चाहिए।

विशेष सावधानी: भूलकर भी न करें चंद्र दर्शन
गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन को पूरी तरह वर्जित माना गया है। मान्यता है कि इस दिन चंद्रमा को देखने से व्यक्ति पर झूठा कलंक या आरोप लगता है। इस दिन सुबह 09:06 बजे से रात 08:04 बजे तक चंद्र दर्शन निषेध रहेगा, अतः इस दौरान आकाश की ओर देखने से बचें।

पौराणिक कथा: कैसे हुआ प्रथमपूज्य भगवान गणेश का प्राकट्य?

धर्म ग्रंथों के अनुसार, एक बार माता पार्वती ने स्नान करने से पूर्व अपने शरीर के उबटन (मैल) से एक बालक की सुंदर मूर्ति बनाई और उसमें प्राण फूंक दिए। माता ने उस बालक को मुख्य द्वार पर पहरा देने का आदेश दिया और कहा कि जब तक वे स्नान कर बाहर न आएं, किसी को भी भीतर प्रवेश न करने दिया जाए।कुछ समय बाद भगवान शिव वहां पहुंचे और भीतर जाने लगे। बालक ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए महादेव को मार्ग में ही रोक दिया। भगवान शिव के बार-बार समझाने पर भी जब वह बालक नहीं माना, तो शिवजी क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया।जब माता पार्वती स्नान कर बाहर आईं और उन्होंने बालक का कटा हुआ सिर देखा, तो वे अत्यंत क्रोधित और विलाप करने लगीं। उन्होंने सृष्टि को नष्ट करने की चेतावनी दे दी। माता पार्वती के क्रोध को शांत करने के लिए भगवान शिव ने देवराज इंद्र को आदेश दिया कि उत्तर दिशा में जो भी पहला जीव मिले, उसका सिर लेकर आएं। देवदूतों को सबसे पहले एक हथिनी का बच्चा (गज) मिला, जिसका सिर लाकर भगवान शिव ने बालक के धड़ से जोड़ दिया और उसमें पुनः प्राण फूंक दिए।इस तरह भगवान गणेश का पुनर्जन्म हुआ और वे ‘गजानन’ कहलाए। भगवान शिव ने उन्हें समस्त देवों में प्रथमपूज्य होने का वरदान दिया, यही कारण है कि किसी भी मांगलिक या शुभ कार्य में सबसे पहले गणेश जी की ही आराधना की जाती है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments