महंगी दवा बेचने वाली कंपनियों से सरकार ₹8,447 करोड़ से अधिक की राशि वसूलेगी। हालांकि इसका एक बड़ा हिस्सा यानी करीब ₹5,800 करोड़ से ज्यादा की रकम फिलहाल कानूनी मुकदमों और कोर्ट-कचहरी के विवादों में फंसी हुई है। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब राष्ट्रीय आंकड़ों से पता चलता है कि देश में किसी भी आम इंसान के इलाज के कुल खर्च का लगभग 19% (यानी करीब पांचवा हिस्सा) सिर्फ दवाओं को खरीदने में ही चला जाता है।
₹8,447 करोड़ की भारी-भरकम वसूली और कानूनी अड़चन
यह पूरा मामला राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) द्वारा दवाओं की ओवरचार्जिंग (तय कीमत से अधिक वसूलने) पर कसी गई नकेल से जुड़ा है। एनपीपीए ने साल 1979 से अब तक दवा कंपनियों के खिलाफ कुल ₹10,029.8 करोड़ की अतिरिक्त वसूली के नोटिस जारी किए हैं। इसमें से कंपनियों ने कुछ हिस्सा तो चुका दिया है, लेकिन कुल मांग का 84% यानी ₹8,447.4 करोड़ अब भी बकाया है।
दशकों पुराने मुकदमों में फंसा जनता का पैसा
इस भारी-भरकम बकाया राशि में से करीब ₹5,800 करोड़ से अधिक की रकम देश के विभिन्न हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मुकदमों के कारण अटकी हुई है। दवा कंपनियों द्वारा अधिक कीमत वसूलने के कई मामले दशकों से अदालतों में लंबित हैं। शुरुआत में कंपनियों पर मूल बकाया राशि कम थी, लेकिन सालों तक मुकदमा चलने के कारण उस पर पेनाल्टी और भारी ब्याज जुड़ता गया, जिससे आज यह आंकड़ा ₹8,447 करोड़ के पार पहुंच चुका है। इस ओवरचार्जिंग लिस्ट में देश-विदेश की कई जानी-मानी और बड़ी दवा निर्माता कंपनियों के नाम शामिल हैं, जिन्होंने तय सरकारी नियमों का उल्लंघन कर मरीजों को महंगी दवाएं बेचीं।
आम जनता की जेब पर इलाज का भारी बोझ
दवाओं पर होने वाला यह कानूनी विवाद सीधे तौर पर आम जनता की जेब को प्रभावित कर रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के नेशनल हेल्थ एकाउंट्स (NHA) की रिपोर्ट के अनुसार, देश के ग्रामीण इलाकों में लोगों के इलाज के कुल खर्च का लगभग 19% से 20% (यानी पांचवा हिस्सा) सिर्फ दवाओं को खरीदने में चला जाता है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह खर्च कुल इलाज का लगभग 14% (सातवां हिस्सा) बैठता है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और संसद की नई तैयारी
सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि जिस तरह कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों की गैर-शेड्यूल दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30% तक सीमित किया गया है, उसी तरह आम लोगों के काम आने वाली अन्य जरूरी दवाओं की बढ़ती कीमतों पर भी व्यापक नियंत्रण क्यों नहीं लगाया जा रहा। वहीं दूसरी ओर, भारी-भरकम राशि कोर्ट में अटके होने के कारण संसद की स्थायी समिति ने भी एनपीपीए (NPPA) को एक समर्पित ‘लीगल सेल’ (कानूनी प्रकोष्ठ) बनाने की सलाह दी है, ताकि फार्मा कंपनियों के खिलाफ इन मुकदमों को तेजी से निपटाकर जनता के हक का पैसा वसूला जा सके।


