भोपाल/इंदौर। मध्य प्रदेश में संपत्तियों की नई सरकारी दरें (कलेक्टर गाइडलाइन) लागू होने के बाद प्रॉपर्टी मार्केट और राजस्व कलेक्शन (Revenue Collection) में एक अप्रत्याशित ट्रेंड देखने को मिल रहा है। जमीन और मकानों के सरकारी दाम बढ़ने के बाद शुरुआती 5 महीनों के जो आंकड़े सामने आए हैं, उसने विभाग के अधिकारियों को भी हैरान कर दिया है। प्रदेश के सबसे बड़े प्रॉपर्टी मार्केट माने जाने वाले महानगर—इंदौर और भोपाल—अपना तय राजस्व लक्ष्य हासिल करने में संघर्ष कर रहे हैं, जबकि विकास की दौड़ में पीछे माने जाने वाले छोटे जिलों ने राजस्व संग्रहण में बाजी मार ली है।
मेट्रो शहरों में सुस्ती: इंदौर-भोपाल का गणित बिगड़ा
विभाग की समीक्षा रिपोर्ट के अनुसार, पंजीयन एवं मुद्रांक विभाग को उम्मीद थी कि दरें बढ़ने से बड़े शहरों से सबसे ज्यादा टैक्स आएगा। लेकिन बढ़े हुए दामों के कारण यहां रजिस्ट्रियों की संख्या में कमी आई है:
- इंदौर की स्थिति: मिनी मुंबई कहे जाने वाले इंदौर को शुरुआती 5 महीनों के लिए ₹1,331 करोड़ का भारी-भरकम राजस्व लक्ष्य दिया गया था। हालांकि, यहां के चारों सब-रजिस्ट्रार ऑफिस मिलकर केवल ₹1,039.37 करोड़ ही जुटा पाए। इस तरह इंदौर अपने लक्ष्य से ₹291.63 करोड़ पीछे रह गया और केवल 78.09% टारगेट ही हासिल कर सका।
- भोपाल का हाल: राजधानी भोपाल के तीन मुख्य पंजीयन कार्यालयों को ₹906 करोड़ की रिकवरी का लक्ष्य मिला था, जिसके मुकाबले सिर्फ ₹762.50 करोड़ का ही कलेक्शन हो पाया। भोपाल अपने टारगेट का केवल 84.16% ही पूरा कर पाया है।
- अन्य बड़े जिलों का प्रदर्शन: सिर्फ इंदौर-भोपाल ही नहीं, बल्कि जबलपुर (82.74%), ग्वालियर (85.10%) और उज्जैन (81.89%) जैसे बड़े शहर भी 85 फीसदी के आंकड़े को पार नहीं कर सके हैं।
छोटे जिलों में जमीनों की रिकॉर्ड खरीद-फरोख्त
बड़े शहरों के विपरीत, मध्य प्रदेश के छोटे और मध्यम स्तर के जिलों में जमीनों की रजिस्ट्रियों में कोई बड़ी गिरावट नहीं देखी गई है। इन जिलों में प्रॉपर्टी निवेशक और स्थानीय खरीदार लगातार सक्रिय हैं, जिसके चलते यहां का राजस्व कलेक्शन अपने तय ग्राफ के अनुसार या उससे बेहतर चल रहा है।
क्यों आई बड़े बाजारों में यह गिरावट?
रियल एस्टेट एक्सपर्ट्स और क्रेडाई (CREDAI) के प्रतिनिधियों के अनुसार, इस अजीब राजस्व गणित के पीछे दो मुख्य कारण हैं:
- गाइडलाइन में अत्यधिक वृद्धि: राज्य की करीब 65,000 लोकेशंस पर सरकारी रेट बढ़ाए गए थे। इंदौर और भोपाल के कई वीआईपी और प्राइम कमर्शियल इलाकों में यह बढ़ोतरी बहुत ज्यादा थी।
- अतिरिक्त वित्तीय बोझ: सर्किल रेट बढ़ने से खरीदारों पर 7.5% स्टांप ड्यूटी और 3% रजिस्ट्रेशन फीस का कुल लोड बढ़ गया है। टैक्स का यह बढ़ता दायरा देखकर बड़े निवेशकों ने फिलहाल अपनी डील्स को होल्ड पर डाल दिया है और वे बाजार के स्थिर होने का इंतजार कर रहे हैं।
सरकारी खजाने को हुए इस नुकसान को देखते हुए वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा अब जिला स्तर पर नई रणनीति बनाई जा रही है ताकि बचे हुए वित्तीय वर्ष में इस कमी को पूरा किया जा सके।


