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अरबों की मालकिन शकीरा खलीली की खौफनाक दास्तान: जब ढोंगी पति ने ताबूत में बंद कर जिंदा दफन कर दिया था

भारत के आपराधिक इतिहास में कई ऐसे मामले दर्ज हैं जिनकी बेरहमी और साज़िश को सुनकर रूह कांप जाती है। ऐसा ही एक सनसनीखेज मामला साल 1991 में बेंगलुरु में सामने आया था, जिसे ‘शकीरा खलीली हत्याकांड‘ के नाम से जाना जाता है। मैसूर रियासत के पूर्व दीवान की पोती और अरबों की मालकिन शकीरा खलीली को उनके ही दूसरे पति, स्वघोषित स्वामी श्रद्धानंद ने संपत्ति के लालच में एक लकड़ी के बड़े संदूक (ताबूत) में बंद कर जिंदा दफन कर दिया था। इस खौफनाक कत्ल का राज करीब तीन साल बाद खुला था।

कौन थीं शकीरा खलीली?

शकीरा खलीली भारत के सबसे रसूखदार परिवारों में से एक से ताल्लुक रखती थीं। वे मैसूर के पूर्व दीवान ‘सर मिर्जा इस्माइल’ की पोती थीं। उनकी शादी भारत के एक वरिष्ठ आईएफएस (IFS) अधिकारी अकबर खलीली से हुई थी और उनकी चार बेटियां थीं। वैभवशाली जीवन जी रही शकीरा की मुलाकात साल 1985 में मुरली मनोहर मिश्रा उर्फ स्वामी श्रद्धानंद से हुई। श्रद्धानंद एक शातिर बहरूपिया था जो अमीर लोगों को अपनी बातों के जाल में फंसाकर उनकी संपत्ति हड़पता था। श्रद्धानंद के प्रभाव में आकर शकीरा ने अपने पहले पति को तलाक दे दिया और 1986 में श्रद्धानंद से शादी कर ली।

अचानक गायब होना और 3 साल का रहस्य

शादी के बाद शकीरा बेंगलुरु के रिचमंड रोड स्थित अपनी करोड़ों की आलीशान कोठी में श्रद्धानंद के साथ रहने लगीं। मई 1991 के बाद अचानक शकीरा रहस्यमयी तरीके से लापता हो गईं। जब भी शकीरा की बेटियां (विशेषकर उनकी बेटी सबाह) मां से बात करने के लिए फोन करतीं, तो श्रद्धानंद हर बार नया बहाना बना देता। वह कभी कहता कि शकीरा अमेरिका में हैं, तो कभी कहता कि वे किसी गुप्त धार्मिक यात्रा पर गई हैं। करीब एक साल तक कोई सुराग न मिलने पर, जून 1992 में बेटी सबाह ने बेंगलुरु के अशोक नगर पुलिस स्टेशन में मां की गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराई।

बेंगलुरु पुलिस की वो खुफिया जांच

शुरुआत में श्रद्धानंद ने पुलिस को फर्जी पत्र दिखाकर गुमराह किया कि शकीरा विदेश में सेटल हो चुकी हैं। लेकिन बेंगलुरु पुलिस के एक जांबाज कांस्टेबल सी. वी. दीपक ने हार नहीं मानी। उन्हें इस केस को गहराई से खंगालने की जिम्मेदारी दी गई थी। कांस्टेबल दीपक ने पाया कि शकीरा की गैर मौजूदगी में श्रद्धानंद लगातार उनके बैंक लॉकर से पैसे निकाल रहा था और कोठी की कीमती जमीनों को बेच रहा था। पुलिस को पूरा यकीन हो गया कि शकीरा के साथ कुछ बहुत गलत हुआ है।

पुलिस ने एक खुफिया योजना बनाई और श्रद्धानंद के करीबियों पर नजर रखी। मार्च 1994 में एक मुखबिर के जरिए पुलिस को पुख्ता जानकारी मिली कि श्रद्धानंद ने नशे की हालत में कुबूल किया है कि “शकीरा कभी वापस नहीं आएगी।” इसके तुरंत बाद पुलिस ने श्रद्धानंद को हिरासत में ले लिया। कड़ी पूछताछ के आगे वह टूट गया और उसने जो सच उगला, उसने देश के कानून व्यवस्था को हिलाकर रख दिया।

चाय में नशा और जिंदा दफनाने की खौफनाक दास्तान

श्रद्धानंद ने कुबूल किया कि शकीरा को उसकी नीयत पर शक होने लगा था, इसलिए उसने उन्हें रास्ते से हटाने का प्लान बनाया। 28 अप्रैल 1991 की रात को उसने शकीरा की चाय में नींद की भारी खुराक मिला दी। जब वे गहरी बेहोशी में चली गईं, तो उसने कोठी के आंगन में पहले से खुदवाए गए एक गहरे गड्ढे (जिसे उसने नौकरों को वाटर टैंक बनाने की बात कही थी) का इस्तेमाल किया।

वह शकीरा को घसीटकर एक बड़े लकड़ी के ताबूतनुमा संदूक में ले गया। शकीरा उस वक्त जिंदा थीं। उसने संदूक का ढक्कन बंद किया और उसे गड्ढे में उतारकर ऊपर से मिट्टी, कंक्रीट और टाइल्स बिछवा दीं।

जब पुलिस ने उसकी निशानदेही पर 3 साल बाद कोठी के आंगन की खुदाई की, तो जमीन के अंदर से शकीरा का कंकाल बरामद हुआ। सबसे हैरान और विचलित कर देने वाली बात फॉरेंसिक जांच में सामने आई। ताबूत के अंदरूनी गद्दे पर शकीरा के नाखूनों के खरोंचने के गहरे निशान थे। इससे यह साबित हुआ कि जब उन्हें दफनाया जा रहा था, तब उन्हें होश आया था और उन्होंने बचने की तड़प में ताबूत को अंदर से नोचा था। दम घुटने के कारण उनकी तड़प-तड़प कर मौत हुई थी।

कानून का फैसला: ताउम्र कैद की सजा

इस ऐतिहासिक और बर्बर केस की सुनवाई सालों तक चली। इस मामले में भारत में पहली बार कंकाल के अवशेषों की पहचान के लिए अत्याधुनिक DNA प्रोफाइलिंग का इस्तेमाल किया गया था। साल 2005 में ट्रायल कोर्ट ने स्वामी श्रद्धानंद को फांसी की सजा सुनाई, जिसे बाद में हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा।

इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। साल 2008 में देश की शीर्ष अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया। कोर्ट ने श्रद्धानंद की फांसी को उम्रकैद में बदल दिया, लेकिन एक सख्त शर्त जोड़ी कि उसे “बिना किसी पैरोल या माफी के, अपनी आखिरी सांस तक जेल में ही रहना होगा।”

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