Monday, September 28, 2026

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आईआईटी इंदौर की बड़ी खोज: अब बायोप्सी के दर्द से मिलेगी राहत, मुंह की लार से होगी माउथ कैंसर की शुरुआती पहचान

आईआईटी इंदौर की बड़ी खोज: अब बायोप्सी के दर्द से मिलेगी राहत, मुंह की लार से होगी माउथ कैंसर की शुरुआती पहचान

इंदौर।

चिकित्सा और तकनीक के क्षेत्र में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) इंदौर के शोधकर्ताओं ने एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी सफलता हासिल की है। अब मुंह के कैंसर (ओरल कैंसर) की सटीक पहचान के लिए मरीजों को किसी दर्दनाक प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा।आईआईटी इंदौर ने एक ऐसी गैर-आक्रामक (Non-Invasive) तकनीक विकसित की है, जिससे सिर्फ मुंह की लार (Saliva) और ओरल स्वैब के जरिए बेहद शुरुआती चरणों में ही माउथ कैंसर का पता लगाया जा सकेगा।

बायोप्सी के दर्द और जटिलताओं से मिलेगी मुक्तिवर्तमान

समय में डॉक्टरों के पास मुंह के कैंसर की पुष्टि करने का एकमात्र मुख्य जरिया बायोप्सी (Biopsy) ही है। इस प्रक्रिया में डॉक्टर मरीज के मुंह के प्रभावित हिस्से से ऊतक (Tissue) का एक छोटा टुकड़ा काट कर निकालते हैं। यह प्रक्रिया न केवल अत्यधिक दर्दनाक होती है, बल्कि इसकी अपनी सीमाएं भी हैं और बड़े पैमाने पर लोगों की स्क्रीनिंग (Mass Screening) करने के लिए इसे व्यावहारिक नहीं माना जाता है।

आईआईटी इंदौर की इस नई स्वैब तकनीक से मरीजों को इस दर्दनाक बायोप्सी टेस्ट से पूरी तरह राहत मिल जाएगी। अब एक साधारण ओरल स्वैब या लार के सैंपल से ही बीमारी का सटीक आकलन संभव हो सकेगा।

‘ब्रिटिश जर्नल ऑफ कैंसर’ में प्रकाशित हुआ शोध

शोधआईआईटी इंदौर के शोधकर्ताओं की इस अभूतपूर्व खोज को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बड़ी सराहना मिली है। यह पूरा शोध कार्य और इसके सकारात्मक परिणाम दुनिया के प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘ब्रिटिश जर्नल ऑफ कैंसर’ में प्रकाशित किए गए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक चिकित्सा विज्ञान में ओरल कैंसर की स्क्रीनिंग के तरीके को पूरी तरह बदल देगी।

समय पर इलाज से बच सकेगी हजारों जान

भारत सहित दुनिया भर में मुंह का कैंसर एक बड़ी समस्या है, और अक्सर मरीज डॉक्टर के पास तब पहुंचते हैं जब बीमारी तीसरे या चौथे चरण में पहुंच चुकी होती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस नई लार-आधारित तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि इसके जरिए बेहद शुरुआती स्तर पर ही कैंसर कोशिकाओं की पहचान की जा सकेगी। समय रहते बीमारी का पता चलने से डॉक्टरों के लिए इलाज शुरू करना आसान होगा, जिससे हजारों मरीजों की जान बचाई जा सकेगी।यह तकनीक न सिर्फ सस्ती और सुलभ है, बल्कि ग्रामीण और दूर-दराज के इलाकों में सामूहिक कैंसर जांच अभियानों (Mass Screening) के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है।

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