राजनीति का ‘आया राम, गया राम’ दौर: 4 साल में 111 सांसद-विधायकों ने बदली पार्टी; सबसे ज्यादा भाजपा में गए, ADR की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा
नई दिल्ली: देश की राजनीति में एक बार फिर दल-बदल का खेल जोरों पर देखने को मिला है। चुनावी सुधारों के लिए काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल इलेक्शन वॉच की ताजा रिपोर्ट में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले चार वर्षों के दौरान देश के कुल 111 निर्वाचित सांसदों और विधायकों ने पाला बदलकर दूसरी पार्टियों का दामन थाम लिया है।
इस राजनीतिक उठापटक का सबसे बड़ा फायदा भारतीय जनता पार्टी (BJP) को हुआ है। पार्टी बदलने वाले कुल जनप्रतिनिधियों में से सबसे ज्यादा 26 प्रतिशत नेता भाजपा में शामिल हुए हैं।
नगालैंड और पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा दलबदल
एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार, देश में दलबदल के सबसे ज्यादा मामले पूर्वोत्तर राज्य नगालैंड और पूर्वी राज्य पश्चिम बंगाल में दर्ज किए गए हैं। इन दोनों राज्यों को मिलाकर कुल दलबदल के करीब 47 फीसदी मामले सामने आए हैं।
- नगालैंड: यहाँ सबसे ज्यादा 32 विधायकों ने अपनी पार्टी छोड़ी। इनमें से ज्यादातर नेता चुनाव जीतने के बाद दूसरी पार्टी में शामिल हुए।
- पश्चिम बंगाल: इस सूची में दूसरे नंबर पर रहा, जहाँ कुल 20 लोकसभा सांसदों ने अपनी पार्टी बदली।
किस पार्टी में गए कितने नेता?
रिपोर्ट के मुताबिक, पाला बदलने वाले 111 जनप्रतिनिधियों में 26 लोकसभा सांसद, 7 राज्यसभा सांसद और 78 विधायक (MLAs) शामिल हैं। नेताओं की पहली पसंद ये पार्टियां रहीं:
- नागा पीपुल्स फ्रंट (NPF): सबसे ज्यादा 32 नेता (29%) इस दल में शामिल हुए।
- भारतीय जनता पार्टी (BJP): दूसरे नंबर पर रही भाजपा में 29 नेताओं (26%) ने प्रवेश किया।
- NCPI: इस पार्टी में कुल 20 नेता (18%) शामिल हुए।
इन तीन प्रमुख दलों को मिला दिया जाए, तो कुल पाला बदलने वाले नेताओं का लगभग 73 फीसदी हिस्सा इन्हीं के खाते में गया है।
क्षेत्रीय दलों को लगा बड़ा झटका
रिपोर्ट से साफ है कि राष्ट्रीय दलों के साथ-साथ क्षेत्रीय स्तर पर भी बड़ा फेरबदल हुआ है। नगालैंड में एनडीपीपी के 25 विधायकों ने पाला बदला, तो वहीं पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) के टिकट पर जीते 20 लोकसभा सांसदों ने दूसरी पार्टी का रुख किया। इसके अलावा तेलंगाना में भारत राष्ट्र समिति (BRS), गोवा में कांग्रेस और पंजाब में भी नेताओं के दल-बदल का असर देखा गया है।
कानून में बदलाव की सिफारिश
देश में बड़े पैमाने पर हो रहे इस दल-बदल को रोकने के लिए एडीआर ने मौजूदा दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) में कड़े सुधारों की वकालत की है। संस्था का सुझाव है कि सांसदों और विधायकों की अयोग्यता का फैसला विधानसभा अध्यक्ष या लोकसभा स्पीकर के बजाय चुनाव आयोग की सलाह पर राष्ट्रपति या राज्यपाल को करना चाहिए। साथ ही, दलबदल करने वाले नेताओं पर दोबारा चुनाव जीतने तक किसी भी प्रकार का सार्वजनिक या मंत्री पद संभालने पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग की गई है।


