भारतीय निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची में सुधार के लिए चलाए गए विशेष अभियान के दौरान उपयोग किए गए सॉफ्टवेयर की गोपनीय जानकारियां सार्वजनिक करने से साफ मना कर दिया है। एक सूचना के अधिकार (RTI) आवेदन के जवाब में आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि संबंधित सॉफ्टवेयर का नाम और उसका वर्जन साझा नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह पूरी तरह से एक ‘ट्रेड सीक्रेट’ (व्यावसायिक गोपनीयता) का मामला है।
यह आरटीआई आवेदन मतदाता सूचियों में सुधार की प्रक्रिया और उसमें इस्तेमाल होने वाली तकनीकी पारदर्शिता को समझने के लिए दायर किया गया था, जिसमें तकनीक से जुड़े कई गंभीर सवाल उठाए गए थे।
सॉफ्टवेयर और तकनीक पर गोपनीयता बरकरार
आयोग से आरटीआई के जरिए पूछा गया था कि चुनावी सूचियों को दुरुस्त करने के लिए जिस स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) सॉफ्टवेयर की मदद ली गई, उसका वास्तविक नाम और वर्जन क्या है। इसके जवाब में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाले आयोग ने स्पष्ट किया कि व्यावसायिक गोपनीयता और बौद्धिक संपदा अधिकारों के नियमों के तहत ऐसी संवेदनशील तकनीकी जानकारियां बाहरी तौर पर साझा नहीं की जा सकतीं। आयोग का तर्क है कि यह सुरक्षा और तकनीकी अखंडता से जुड़ा विषय है।
AI के इस्तेमाल और नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल
आवेदन में यह भी जानने की कोशिश की गई थी कि क्या मतदाता सूची से विसंगतियों या डुप्लिकेट नामों को छांटने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), मशीन लर्निंग अथवा किसी खास ऑटोमेटेड तकनीक का उपयोग किया गया है। इसके साथ ही यह भी पूछा गया था कि क्या यह सॉफ्टवेयर खुद नामों को हटाने या जोड़ने का निर्णय लेता है।
इस पर तकनीकी विवरण देने से बचते हुए आयोग ने साफ किया कि डेटा में विसंगतियों को चिह्नित करने के लिए सॉफ्टवेयर केवल एक सहायक माध्यम की तरह काम करता है। मतदाता सूची में किसी भी नागरिक का नाम जोड़ने, हटाने या संशोधन करने का अंतिम और कानूनी अधिकार केवल संबंधित विधानसभा क्षेत्रों के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ERO) के पास ही सुरक्षित होता है। जमीनी स्तर पर दस्तावेजों की जांच और आधिकारिक सत्यापन के बाद ही कोई भी प्रशासनिक बदलाव किया जाता है।
सुरक्षा का हवाला देकर अधिकारियों के नाम छिपाए
इसके अतिरिक्त, सॉफ्टवेयर द्वारा फ्लैग किए गए डेटा की अंतिम समीक्षा करने वाले और उसे स्वीकृत करने वाले तकनीकी व प्रशासनिक अधिकारियों के नाम और पदों की सूची देने से भी चुनाव आयोग ने इनकार कर दिया है। आयोग ने इसके पीछे सुरक्षा कारणों और अधिकारियों की व्यक्तिगत निजता का हवाला दिया है। आयोग के इस फैसले के बाद चुनावी प्रक्रियाओं में सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल और तकनीकी पारदर्शिता को लेकर एक नई प्रशासनिक और कानूनी बहस शुरू हो गई है।


