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Haiwaan Movie Review: 18 साल बाद पर्दे पर लौटे अक्षय-सैफ, लेकिन कमजोर कहानी ने फीका किया थ्रिलर का रोमांच; जानिए कैसी है फिल्म

Haiwaan Movie Review: 18 साल बाद पर्दे पर लौटे अक्षय-सैफ, लेकिन कमजोर कहानी ने फीका किया थ्रिलर का रोमांच; जानिए कैसी है फिल्म

सिनेमा डेस्क (NTV TIME): बॉलीवुड में जब भी प्रियदर्शन, अक्षय कुमार और सैफ अली खान का नाम एक साथ आता है, तो दर्शकों को एक बेहतरीन सिनेमा की उम्मीद होती है। पूरे 18 साल के लंबे इंतजार के बाद यह जोड़ी फिल्म ‘हैवान’ (Haiwaan) के जरिए बड़े पर्दे पर वापस लौटी है। साल 2016 की एक सुपरहिट दक्षिण भारतीय थ्रिलर फिल्म की इस ऑफिशियल रीमेक से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन क्या यह फिल्म आज के दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतर पाती है? आइए जानते हैं इस विस्तृत इन-डेप्थ रिव्यू में:

क्या है फिल्म की कहानी?

फिल्म की कहानी घूमती है श्याम (सैफ अली खान) के इर्द-गिर्द, जो एक बड़ी रिहायशी बिल्डिंग में केयरटेकर का काम करता है। श्याम आंखों से देख नहीं सकता, लेकिन उसके सुनने और सूंघने की क्षमता आम इंसानों से कई गुना ज्यादा तेज है। कहानी में मोड़ तब आता है जब एक अमीर शख्स की संदिग्ध हालात में हत्या हो जाती है और उस कत्ल का इकलौता गवाह श्याम बनता है।

इसके बाद एंट्री होती है परशुराम (अक्षय कुमार) की, जो एक बेहद खूंखार और दिमागी रूप से अस्थिर साइको किलर है। परशुराम एक मासूम बच्ची की जान के पीछे पड़ा है और अब उस बच्ची को बचाने की पूरी जिम्मेदारी अकेले इस नेत्रहीन केयरटेकर श्याम के कंधों पर आ जाती है। एक ऐसा इंसान जो कातिल को देख नहीं सकता, वो उसे कैसे रोकेगा—यही फिल्म का मुख्य आधार है।

अभिनय: अक्षय का खूंखार अंदाज और सैफ की मेहनत

  • अक्षय कुमार: लंबे समय बाद अक्षय कुमार को एक पारंपरिक हीरो की छवि तोड़कर पूरी तरह से नेगेटिव (विलेन) किरदार में देखना सुखद है। उन्होंने एक पागल और हिंसक हत्यारे के रूप में अपनी फिजिकैलिटी और स्क्रीन प्रेजेंस का अच्छा इस्तेमाल किया है। हालांकि, कुछ दृश्यों में उनका लाउड हंसना और चिल्लाना थोड़ा पुराना (80 के दशक जैसा) महसूस होता है।
  • सैफ अली खान: सैफ अली खान ने एक दृष्टिबाधित मार्शल आर्ट एक्सपर्ट के किरदार को निभाने के लिए कड़ी मेहनत की है। उनके चेहरे के भाव और बिना दृष्टि के दुनिया को नेविगेट करने का तरीका फिल्म के कुछ हिस्सों को बेहद बांधकर रखता है।
  • सहयोगी कलाकार: बोमन इरानी, श्रिया पिलगांवकर और राजपाल यादव जैसे मंझे हुए कलाकारों को स्क्रीन पर ज्यादा मौका नहीं मिल पाया है और उनके किरदार काफी कमजोर लिखे गए हैं।

कहाँ मात खा गई फिल्म?

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका धीमा स्क्रीनप्ले और 165 मिनट का लंबा रनटाइम है। एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म में जो रफ्तार और सस्पेंस होना चाहिए, वो इसमें गायब दिखता है। निर्देशक प्रियदर्शन ने कहानी को बिल्कुल फ्रेम-टू-फ्रेम कॉपी करने की कोशिश की है, लेकिन आज से दस साल पहले जो कहानी नई लगती थी, वो आज के दर्शकों के लिए काफी हद तक प्रेडिक्टेबल (जिसका अंदाजा पहले से लग जाए) हो चुकी है। फिल्म का पहला हाफ बहुत खिंचा हुआ लगता है और बेवजह के कॉमेडी सीन थ्रिलर के मूड को भटकाते हैं।

तकनीकी पक्ष और निर्देशन

बिल्डिंग के भीतर के सेट्स, शैडो लाइटिंग और सिनेमैटोग्राफी बेहतरीन है जो एक डार्क थ्रिलर का माहौल तो बनाती है, लेकिन बैकग्राउंड म्यूजिक और कमजोर संपादन (Editing) इस माहौल को लंबे समय तक टिकने नहीं देते। क्लाइमेक्स में सैफ और अक्षय के बीच का मुकाबला एक्शन के लिहाज से ठीक है, लेकिन उसमें भी कई लॉजिक की कमियां साफ नजर आती हैं।
‘हैवान’ एक अच्छा मौका थी जहां दो बड़े स्टार्स को एक अनोखे थ्रिलर में पेश किया गया, लेकिन आउटडेटेड कहानी और कमजोर डायरेक्शन के चलते यह फिल्म एक औसत दर्जे की थ्रिलर बनकर रह जाती है। अगर आप अक्षय कुमार और सैफ अली खान के बहुत बड़े फैन हैं, तो इसे एक बार देख सकते हैं।


‘हैवान’ एक अच्छा मौका थी जहां दो बड़े स्टार्स को एक अनोखे थ्रिलर में पेश किया गया, लेकिन आउटडेटेड कहानी और कमजोर डायरेक्शन के चलते यह फिल्म एक औसत दर्जे की थ्रिलर बनकर रह जाती है। अगर आप अक्षय कुमार और सैफ अली खान के बहुत बड़े फैन हैं, तो इसे एक बार देख सकते हैं।

NTV TIME रेटिंग: 2 / 5 स्टार


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