मिडिल ईस्ट महासंग्राम: अमेरिका-ईरान युद्ध, रेड सी पर हूतियों का कब्जा और इजरायल के चौतरफा हमले
इस समय मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) एक भयंकर और अभूतपूर्व सैन्य संकट की गिरफ्त में है। तीन अलग-अलग मोर्चों पर जारी भीषण जंग ने मिलकर एक ऐसा चक्रव्यूह बना दिया है, जिसने न सिर्फ वैश्विक महाशक्तियों को आमने-सामने ला दिया है, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और भारत की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इन तीनों मोर्चों की स्थिति और उनके संयुक्त प्रभाव की पूरी रिपोर्ट नीचे दी गई है।
मोर्चा 1: अमेरिका-ईरान सीधी जंग
अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने भीषण जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरान के 5 बड़े कच्चे तेल के टैंकरों को बमबारी कर समुद्र में डुबो दिया है। अमेरिकी दावों के मुताबिक, यह कार्रवाई ईरान द्वारा अमेरिकी युद्धपोतों पर दागी गई बैलिस्टिक मिसाइलों के जवाब में की गई है। इसके जवाब में ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास अमेरिका से जुड़े 10 जहाजों पर हमला किया और जॉर्डन में स्थित अमेरिकी सैन्य बेस पर मिसाइलें दागी हैं। ईरान ने अमेरिकी नौसेना का एक अंडरवातर ड्रोन भी जब्त कर लिया है।
मोर्चा 2: रेड सी पर हूती विद्रोहियों का पूर्ण कब्जा
ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने एक बहुत बड़ा रणनीतिक सैन्य ऑपरेशन पूरा करते हुए यमन की पूरी रेड सी कोस्टलाइन (लाल सागर तट) और मोखा बंदरगाह पर कब्जा कर लिया है। हूती लड़ाके अब दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक जलमार्ग ‘बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य’ के मुहाने पर स्थित रणनीतिक पेरिम द्वीप तक पहुंच गए हैं। सऊदी समर्थित सरकारी सेना वहां से पीछे हट चुकी है। इस कब्जे के बाद हूती विद्रोही वैश्विक समुद्री व्यापार के नए ‘गेटकीपर’ बन गए हैं, जिससे 12% वैश्विक व्यापारिक मार्ग उनके सीधे नियंत्रण में आ गया है।
मोर्चा 3: लेबनान और सीरिया में इजरायल के विनाशकारी हमले
जून में हुए युद्धविराम समझौतों के बावजूद, इजरायल ने लेबनान और सीरिया के भीतर अपने सैन्य ऑपरेशनों को बेहद आक्रामक कर दिया है। इजरायली लड़ाकू विमानों ने दक्षिणी लेबनान के रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया है, जिसमें कई नागरिकों और डॉक्टरों की मौत हुई है। इजरायल का कहना है कि यह कार्रवाई उसके सैनिकों पर हुए ड्रोन हमलों के जवाब में की जा रही है। वहीं सीरियाई सीमा के भीतर भी इजरायल के सैन्य एक्शन और नागरिकों को हिरासत में लेने को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं।
इन तीनों जंगों के एक साथ मिलने के मायने क्या हैं?
कच्चे तेल का महासंकट: अमेरिका द्वारा ईरानी टैंकरों को डुबोए जाने और हूतियों द्वारा रेड सी के मुहाने पर कब्जा करने से वैश्विक तेल बाजार में हड़कंप मच गया है। ब्रेंट क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जा चुकी हैं। यदि यह तनाव ऐसे ही बढ़ा, तो आने वाले दिनों में भारत सहित पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल और परिवहन की लागत आसमान छूने लगेगी।
सप्लाई चेन का ठप होना: दुनिया के दो सबसे बड़े मैरीटाइम चोक-पॉइंट्स—स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (ईरान के पास) और बाब अल-मंदेब (हूतियों के पास)—इस समय सीधे युद्ध क्षेत्र बन चुके हैं। जहाजों को अब पूरे अफ्रीका महाद्वीप का चक्कर लगाकर जाना पड़ रहा है, जिससे माल भाड़ा 3 से 4 गुना बढ़ गया है और सामान पहुंचने में हफ्तों की देरी हो रही है।
भारत के लिए दोहरी चुनौती: भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। तेल महंगा होने से भारत का राजकोषीय घाटा बढ़ेगा और घरेलू बाजार में महंगाई बढ़ेगी। कूटनीतिक मोर्च पर, भारत के अमेरिका और इजरायल के साथ मजबूत रक्षा संबंध हैं, लेकिन खाड़ी देशों और ईरान के साथ भी भारत के गहरे रणनीतिक और व्यापारिक हित हैं। भारत इस युद्ध को रोकने के लिए ‘संवाद और कूटनीति’ की अपील कर रहा है, लेकिन क्षेत्र में बढ़ता तनाव भारत की ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है।


