इंदौर मेट्रो: हाईकोर्ट का बड़ा निर्देश – पक्षी विशेषज्ञों की देखरेख में कटेंगे पेड़, तोतों के आशियाने की सुरक्षा के लिए हर साल देनी होगी रिपोर्ट
इंदौर: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने इंदौर मेट्रो रेल प्रोजेक्ट के तहत रानी सराय और रीगल चौराहा क्षेत्र में पेड़ों की कटाई को लेकर एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि मेट्रो स्टेशन निर्माण के रास्ते में आ रहे उन पुराने और विशाल पेड़ों की कटाई व ट्रांसप्लांटेशन (पुनर्स्थापना) का कार्य पूरी तरह से पक्षी विशेषज्ञों की सीधी निगरानी में किया जाएगा, जो हजारों तोतों का आशियाना हैं।
इसके साथ ही, माननीय कोर्ट ने मेट्रो प्रशासन को आदेश दिया है कि उन्हें इस पूरी प्रक्रिया और पर्यावरण संरक्षण के उपायों से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट हर साल अदालत के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।
क्या है पूरा मामला?
इंदौर के ऐतिहासिक रानी सराय और रीगल तिराहा क्षेत्र में भूमिगत मेट्रो स्टेशन का निर्माण प्रस्तावित है। इस निर्माण कार्य की जद में करीब 160 से अधिक पुराने और घने पेड़ आ रहे हैं। इन पेड़ों पर सदियों से हजारों की संख्या में हरे तोते रहते हैं, जो शहर की जैव विविधता का एक बेहद खूबसूरत हिस्सा हैं।
पर्यावरण और वन्यजीव प्रेमियों ने इन तोतों के प्राकृतिक आवास को उजड़ने से बचाने के लिए हाईकोर्ट में जनहित याचिका (PIL) दायर की थी। याचिका में दलील दी गई थी कि अंधाधुंध पेड़ों की कटाई से हजारों पक्षी बेघर हो जाएंगे और शहर का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ जाएगा।
मेट्रो प्रबंधन का पक्ष और चुनौतियाँ
सुनवाई के दौरान मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन ने अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखते हुए बताया कि रानी सराय क्षेत्र के अलावा स्टेशन निर्माण के लिए कोई अन्य व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध नहीं है। प्रबंधन ने कोर्ट को यह भी अवगत कराया कि यदि स्टेशन के स्थान में जरा भी बदलाव किया जाता है, तो परियोजना की लागत में लगभग 400 करोड़ रुपये तक का अतिरिक्त खर्च आएगा और काम में भी लंबा समय लगेगा।
हाईकोर्ट के मुख्य निर्देश
दोनों पक्षों की दलीलों को गहराई से सुनने और पर्यावरण व विकास के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते हुए हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने निम्नलिखित कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं:
- विशेषज्ञों की निगरानी: पेड़ों की छंटाई, कटाई या उन्हें अन्य स्थान पर शिफ्ट करने की पूरी प्रक्रिया पक्षी विशेषज्ञों और स्वतंत्र वैज्ञानिकों की देखरेख में ही होगी।
- सालाना रिपोर्ट अनिवार्य: मेट्रो प्रशासन को हर साल पक्षियों के संरक्षण, नए पौधे लगाने और उनके जीवित रहने के आंकड़ों की प्रगति रिपोर्ट कोर्ट में पेश करनी होगी।
- घोंसलों की सुरक्षा: जब तक पक्षी विशेषज्ञों द्वारा सक्रिय घोंसलों और पक्षियों के प्रजनन स्थलों की वैज्ञानिक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक संवेदनशील पेड़ों को छूने से बचने का सुझाव दिया गया है।
- वैकल्पिक प्रयास: निर्माण कार्य के दौरान होने वाले शोर, कंपन और भारी रोशनी के प्रभाव को न्यूनतम रखने के निर्देश दिए गए हैं ताकि वहां रह रहे पक्षियों को परेशानी न हो।
अदालत का यह फैसला साफ तौर पर संदेश देता है कि शहर के विकास के लिए बुनियादी ढांचा जितना जरूरी है, पर्यावरण और बेजुबान वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों की रक्षा करना भी उतना ही अनिवार्य है।


