गौरव जोशी
इंदौर/न्यूज़ डेस्क: हमारे देश में एक बेहद दुखद और शर्मनाक ट्रेंड बन चुका है। जब भी कोई खौफनाक अपराध होता है, किसी मासूम की जिंदगी तबाह होती है, तो न्याय की गुहार से पहले राजनीति का शोर शुरू हो जाता है। संवेदनाएं और इंसाफ की मांग बहुत पीछे छूट जाती हैं, और बड़े नेता से लेकर तथाकथित बुद्धिजीवी (Intellectuals) तक, अपराधियों और घटनाओं को राजनीतिक तराजू में तोलने लगते हैं।
हाल ही में बिहार के जमुई से आई बेहद विचलित करने वाली घटना इसका सबसे ताजा और जीवंत उदाहरण है। जहां कोचिंग से लौट रही 10वीं की एक नाबालिग छात्रा और उसके दोस्त को सरेराह रोककर बर्बरता और बदसलूकी की गई। इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद पूरा देश गुस्से में है, लेकिन शर्मनाक बात यह है कि इस पर भी संवेदनशीलता दिखाने के बजाय राजनीतिक बयानबाजी और लीपापोती का खेल शुरू हो गया।
अपराधियों से ज्यादा प्रतीकों पर ध्यान और ‘छिटपुट’ बयानों की शर्म
जमुई की घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सत्ता और वोट बैंक का गणित जनता की सुरक्षा से बड़ा हो चुका है। जब कोई बड़ी घटना होती है, तो यह देखने के बजाय कि अपराधी को तुरंत और सख्त सजा कैसे मिले, राजनीतिक दल यह देखने में लग जाते हैं कि घटना को दबाया कैसे जाए या इसका इस्तेमाल विपक्ष को घेरने में कैसे हो।
हद तो तब हो जाती है जब सत्ता में बैठे जिम्मेदार लोग ऐसी भयावह वारदातों को “छिटपुट घटना” (Isolated Incident) कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं। किसी मासूम की अस्मत और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचना नेताओं के लिए महज एक ‘आंकड़ा’ या ‘छिटपुट बात’ कैसे हो सकता है? जब अपराधी एक विशेष खेमे से होता है, तो दूसरा खेमा भगवा या हरा चश्मा पहनकर आक्रामक हो जाता है; और जब पासा उलटता है, तो मौन साध लिया जाता है। जुर्म के खिलाफ एक सुर में खड़े होने के बजाय, देश का विमर्श रंगों, प्रतीकों और सरकारों को बचाने की बहस में उलझकर रह गया है।
कानून कागजों पर सख्त, लेकिन जमीन पर खौफ क्यों नहीं?
जमुई मामले में जनाक्रोश के बाद पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए एसआईटी (SIT) का गठन किया और मुठभेड़ व गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी नौबत ही क्यों आती है? अपराधियों में अपराध करने से पहले कानून का डर क्यों नहीं होता? इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- लचर और धीमी न्याय प्रक्रिया: देश में सख्त कानून (जैसे POCSO एक्ट) मौजूद हैं, लेकिन अदालतों में मुकदमों का सालों-साल चलना अपराधियों को हौसला देता है। जब तक ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ सचमुच फास्ट काम नहीं करेंगे, तब तक खौफ पैदा नहीं होगा।
- राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण: अपराधियों को जब यह भरोसा होता है कि उनके पीछे कोई ‘जातीय, धार्मिक या राजनीतिक पावर’ है, तो वे कानून को ठेंगे पर रखने लगते हैं।
- नेताओं की संवेदनहीनता: जब बड़े नेता ही घटनाओं का बचाव करने लगते हैं या उन्हें सामान्य बताने लगते हैं, तो अपराधियों का दुस्साहस और बढ़ जाता है।
बदलाव की जरूरत: जब तक सवाल नहीं बदलेंगे, सियासत नहीं बदलेगी
इस घिनौने चक्रव्यूह को तोड़ने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी देश के आम नागरिकों की है। जमुई जैसी घटनाएं चीख-चीख कर कह रही हैं कि अब बदलाव का वक्त आ गया है। जब तक जनता नेताओं से उनकी खोखली दलीलों के बजाय महिला सुरक्षा, कड़े कानून और त्वरित न्याय (Fast-track Justice) पर सीधे सवाल नहीं करेगी, तब तक राजनेता हमें रंगों और धर्म की राजनीति में उलझाते रहेंगे।
अपराधी सिर्फ एक अपराधी होता है, उसका कोई मजहब, जाति या राजनीतिक दल नहीं होना चाहिए। देश के कानून को इतना दृढ़, निष्पक्ष और तेज होना होगा कि जमुई जैसी वारदात दोबारा करने की सोच रखने वाले की भी रूह कांप उठे। लाशों, सरेराह होती बदसलूकी और मजहबी रंगों पर अपनी रोटियां सेकने वाली सियासत पर अब पूर्णविराम लगना ही चाहिए।


