Monday, October 26, 2026

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राजनीति का ‘जाति-चक्र’ और बंटता समाज

गौरव जोशी

राजनीति का ‘जाति-चक्र’ और बंटता समाज

​भारतीय राजनीति के केंद्र में आज विचार, विकास और विजन से ज्यादा ‘गिनती’ और ‘पहचान’ का शोर है। जातिगत जनगणना की मांग हो या जातियों का गोलबंद समीकरण, यह स्वीकार करने में अब कोई झिझक नहीं होनी चाहिए कि चुनावी बिसात पर समाज को छोटी-छोटी श्रेणियों में बांटकर ही सत्ता की सीढ़ियां तय की जा रही हैं।

​जब-जब चुनाव नजदीक आते हैं, सामाजिक समरसता की बातें नारों तक सिमट जाती हैं और धरातल पर शुरू होती है—जाति की राजनीति। हर दल अपने हिसाब से जातियों का अंकगणित साधने में जुट जाता है। किसी के लिए आरक्षण केवल सामाजिक न्याय की मांग न होकर वोटबैंक का सुरक्षा कवच बन चुका है, तो किसी के लिए जातिगत जनगणना एक राजनीतिक ब्रह्मास्त्र।

​सवाल यह नहीं है कि दबे-कुचले और वंचित वर्गों को उनका अधिकार मिलना चाहिए या नहीं—निसंदेह मिलना ही चाहिए। सवाल यह है कि क्या जाति ही किसी नागरिक का एकमात्र परिचय बनकर रह गई है? जब राजनीति केवल जातियों के आंकड़ों पर चलने लगती है, तब योग्यता, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और राष्ट्रीय विकास जैसे साझा मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं।

​जातिवाद की इस सियासत का सबसे भयावह पहलू यह है कि यह नागरिकों के बीच का संवाद खत्म कर देती है। एक ही मोहल्ले, एक ही गांव और एक ही राष्ट्र में रहने वाले लोग आपस में पड़ोसी होने से पहले ‘जाति’ के चश्मे से देखे जाने लगते हैं।

​इस विषय की गंभीरता को समेटती एक कविता:

​कुर्सियों के खेल में फिर से बिछी हैं गोटियां,

फिर से बांटी जा रही हैं जातियां और रोटियां।

​तुम कहो किस धर्म के हो, तुम बताओ कौन सी जात?

अब नहीं होती चुनावों में विकास और काम की बात।

​बांटकर हर एक टोले को, बड़ा वो कद बनाते हैं,

हम हवा में नफरतों के ही तो बीज बोते जाते हैं।

​वोट की खातिर जो इंसान को इंसान न समझे,

उस सियासत की हकीकत को भला कौन न समझे?

​जोड़ ले जो हर हृदय को, अब उसी का नाम हो,

जाति से ऊपर उठकर केवल राष्ट्र का ही काम हो।

जातिगत पहचानों पर आधारित राजनीति भले ही किसी दल को अल्पकालिक चुनावी फायदा पहुंचा दे, लेकिन दीर्घकाल में यह समाज की बुनियाद को कमजोर करती है। लोकतंत्र तब तक मजबूत नहीं हो सकता जब तक मतदाता जाति के दायरों से बाहर निकलकर विकास, नीति और योग्यता के आधार पर अपने प्रतिनिधियों का चुनाव नहीं करते। अब समय आ गया है कि समाज खुद से यह सवाल पूछे—क्या वह केवल एक वोट बैंक बनकर रहना चाहता है या एक जागरूक और एकजुट नागरिक?

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