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निजी कुआं, सरकारी सेंध: बिगपुर पंचायत में ‘मरम्मत’ के नाम पर जनता के पैसों का खुलेआम बंदरबांट!

निजी कुआं, सरकारी सेंध: बिगपुर पंचायत में ‘मरम्मत’ के नाम पर जनता के पैसों का खुलेआम बंदरबांट!

छतरपुर/लवकुशनगर।पंडित राजा रूपौलिहा
पत्रकार
भ्रष्टाचार और सिस्टम की मिलीभगत का एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है जिसने ग्राम पंचायत की शुचिता को तार-तार कर दिया है। ग्राम पंचायत बिगपुर में सरकारी तिजोरी पर डाका डालने का एक नया खेल उजागर हुआ है, जहाँ सरपंच और सचिव ने मिलकर नियमों को ताक पर रखते हुए एक निजी कुएं की मरम्मत पर सरकारी राशि फूंक दी। मई-जून 2026 में हुए इस कारनामे ने पंचायत राज व्यवस्था के जिम्मेदारों और तकनीकी अधिकारियों की नीयत पर तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं।

रसूखदारों की जमीन, सरकार की जेब: यह कैसी साठगांठ?

पुख्ता जानकारी के मुताबिक, पटेल मोहल्ले में स्थित यह पुराना कुआं श्याम सुंदर पटेल और फदाली पटेल (दोनों पिता बारेलाल पटेल) की पुश्तैनी और निजी जमीन पर स्थित है। कानूनन किसी भी निजी संपत्ति पर सरकारी फंड का इस्तेमाल संगीन अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर किस हैसियत और किस आधार पर सरपंच भवानी प्रजापति और सचिव कालीचरण कुशवाहा ने इस कुएं के जीर्णोद्धार के लिए सरकारी खजाना खोल दिया? क्या यह सीधे तौर पर पद का दुरुपयोग और वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं है?

‘कागजी घोड़ों’ का खेल: फाइलों में छिपा है महाघोटाला

इस भ्रष्टाचार की जड़ें सरकारी फाइलों के भीतर तक धंसी हुई हैं। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले की फाइलें खंगालने की हिम्मत जुटा पाता है या नहीं। जांच के घेरे में ये मुख्य बिंदु होने चाहिए:

  • फर्जी प्रस्ताव: वह कौन सा प्रस्ताव था जिसके तहत इस निजी कुएं को सार्वजनिक संपत्ति दिखाकर राशि स्वीकृत कराई गई?
  • राजस्व रिकॉर्ड बनाम पंचायत रिकॉर्ड: यदि खसरा रिकॉर्ड में जमीन निजी है, तो पंचायत के दस्तावेजों में इसे सरकारी या सार्वजनिक कैसे दर्ज किया गया? यह जालसाजी किसके इशारे पर हुई?
  • अधिकारियों की संलिप्तता: भुगतान से पहले किन-किन वरिष्ठ अधिकारियों ने बिना जमीनी हकीकत जाने दस्तावेजों और बिल-वाउचरों पर अपनी हरी झंडी दी? सिस्टम पर करारा तमाचा: इंजीनियर की भूमिका और सरपंच पति का ‘अहंकार’

इस पूरे घालमेल में तकनीकी स्वीकृति देने वाले इंजीनियर की भूमिका सबसे ज्यादा संदिग्ध है। क्या इंजीनियर साहब ने एयरकंडीशंड दफ्तर में बैठकर ही माप पुस्तिका (MB) भर दी या मौके पर जाकर अपनी जेबें गर्म कर लीं? कार्य की मात्रा और स्थान को लेकर माप पुस्तिका में क्या फर्जीवाड़ा किया गया है, इसकी गहराई से तकनीकी जांच होनी चाहिए।
हद तो तब हो गई जब इस महाघोटाले पर सरपंच के पति श्रीराम प्रजापति का एक बेहद शर्मनाक और व्यवस्था को चुनौती देता कथित बयान सामने आया— “इंजीनियर ने पास कर दिया, उसका कुछ नहीं होना है।” यह बयान साफ दर्शाता है कि भ्रष्टाचारियों के हौसले कितने बुलंद हैं और उन्हें वरिष्ठ अधिकारियों तथा प्रशासनिक कार्रवाई का रत्ती भर भी खौफ नहीं है। क्या इंजीनियर का सर्टिफिकेट भ्रष्टाचार को ईमानदारी का तमगा दे देता है?

वरिष्ठ अधिकारियों की साख दांव पर: अब कार्रवाई होगी या लीपापोती?

बिगपुर का यह मामला अब सिर्फ एक कुएं की मरम्मत तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह सिस्टम की रीढ़ पर एक बड़ा प्रहार है। जिला प्रशासन और वरिष्ठ अधिकारियों के सामने अब अपनी साख बचाने की असली परीक्षा है। अगर प्रशासन सचमुच निष्पक्ष है, तो उसे तत्काल प्रभाव से:

  1. खसरा और राजस्व रिकॉर्ड की जांच करानी होगी।
  2. तकनीकी स्वीकृति देने वाले इंजीनियर को सस्पेंड कर जांच के दायरे में लाना होगा।
  3. सरपंच-सचिव के वित्तीय अधिकारों पर रोक लगाकर एफआईआर (FIR) दर्ज करानी होगी।

जनता का सीधा सवाल है— अगर कुआं निजी है तो सरकारी पैसा किसकी जेब में गया? अगर सब कुछ नियमों के तहत हुआ है तो पंचायत पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक करने से डर क्यों रही है? जवाब तो साहब, अब देना ही होगा!

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