CRIMEX : इंदौर महाराजा, मुंबई की डांसर और वो तीन गोलियां… 1925 का वो शाही कत्ल जिसने ब्रिटिश हुकूमत को हिला दिया!
क्राइम डेस्क, NTV TIME
12 जनवरी 1925 की शाम को मुंबई के सबसे पॉश इलाके मालाबार हिल पर जो कुछ भी हुआ, उसने भारत के इतिहास को हमेशा के लिए बदल दिया। एक आलीशान खुली गाड़ी, देश का सबसे अमीर बिजनेसमैन, इंदौर के राजमहल से भागी एक खूबसूरत डांसर और अचानक गूंजी ताबड़तोड़ गोलियां! आज ‘क्राइमएक्स’ में हम खोल रहे हैं इतिहास की सबसे सनसनीखेज ‘बावला मर्डर केस’ की पूरी फाइल।
क्राइम सीन: मालाबार हिल की वो खूनी शाम
शाम के ठीक 5:00 बजे थे। मुंबई की ठंडी समुद्री हवाओं के बीच देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट टायकून अब्दुल कादिर बावला अपनी नई चमचमाती कार में घूम रहे थे। उनके बगल में बैठी थीं मुमताज बेगम। मुमताज कोई साधारण महिला नहीं थीं, वह इंदौर रियासत के महाराजा के दरबार की सबसे मशहूर और खूबसूरत डांसर थीं, जो कुछ समय पहले ही महाराज की बंदिशों को तोड़कर इंदौर से मुंबई भाग आई थीं। बावला ने मुमताज का हाथ थामकर कहा ही था कि अब वो सुरक्षित हैं, तभी अचानक एक तेज रफ्तार लाल रंग की कार ने उनकी गाड़ी का रास्ता रोक लिया। यह गाड़ी किसी और की नहीं, बल्कि इंदौर स्टेट के नाम पर रजिस्टर्ड थी!
भरे बाजार में ताबड़तोड़ गोलियां और किडनैपिंग की कोशिश
गाड़ी रुकते ही उसमें से 6-7 हथियारबंद नकाबपोश निकले। उनके हाथों में धारदार कुल्हाड़ियां और पिस्तौलें थीं। हमलावरों के नेता ने चिल्लाकर कहा—”मुमताज को हमारे हवाले कर दो, महाराज का हुक्म है!” जब बावला मुमताज को बचाने के लिए आगे बढ़े, तो हमलावरों ने बेहद करीब से तीन गोलियां बावला के सीने में उतार दीं। बावला मौके पर ही खून से लथपथ होकर गिर गए। हमलावर मुमताज के बाल पकड़कर उसे घसीटते हुए ले जाने लगे। मुमताज की चीखें पूरे मालाबार हिल पर गूंज रही थीं।
ब्रिटिश फौजियों की एंट्री और कातिलों की धरपकड़
तभी वहां से ब्रिटिश सेना के चार अधिकारी गुजरे। बिना बंदूक के, सिर्फ अपनी गोल्फ स्टिक लेकर वे उन हथियारबंद कातिलों पर टूट पड़े। फौजियों की बहादुरी देखकर हमलावर डर गए। वे मुमताज को वहीं छोड़कर अपनी कार से इंदौर की तरफ भाग निकले। बावला को अस्पताल ले जाया गया, जहां उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
जब तार जुड़े इंदौर के ‘लाल बाग पैलेस’ से!
मुंबई पुलिस के कमिश्नर जब मुमताज बेगम से पूछताछ करने बैठे, तो मुमताज के एक खुलासे ने पूरी ब्रिटिश हुकूमत के होश उड़ा दिए। मुमताज ने अपने बयान में कहा, “सर, कत्ल करने वाले कोई मामूली गुंडे नहीं थे। वो इंदौर के महाराजा के खास बॉडीगार्ड्स और मिलिट्री अफसर थे। महाराज मुझे किसी भी कीमत पर वापस इंदौर के लाल बाग पैलेस ले जाना चाहते हैं, क्योंकि मैंने उनका महल छोड़ा था।” यह मामला अब सिर्फ एक मर्डर का नहीं रह गया था। यह सीधे तौर पर ब्रिटिश हुकूमत बनाम इंदौर रियासत की सबसे बड़ी राजनीतिक और कानूनी जंग बन चुका था। मुंबई पुलिस ने तुरंत इंदौर की तरफ कूच करने की तैयारी कर ली।
कोर्ट रूम ड्रामा और इंदौर पैलेस पर शिकंजा
अब्दुल कादिर बावला की हत्या और मुमताज के सनसनीखेज खुलासे के बाद बॉम्बे पुलिस ने सीधे इंदौर का रुख किया। ब्रिटिश हुकूमत के कड़े रुख के आगे इंदौर रियासत को झुकना पड़ा। पुलिस ने महाराजा के बेहद करीबी मिलिट्री अफसरों और बॉडीगार्ड्स को गिरफ्तार कर लिया, जिनमें आनंदराव फड़के और शफी अहमद जैसे बड़े नाम शामिल थे।
कोर्ट रूम ड्रामा और इंदौर पैलेस पर शिकंजा
अब्दुल कादिर बावला की हत्या और मुमताज के सनसनीखेज खुलासे के बाद बॉम्बे पुलिस ने सीधे इंदौर का रुख किया। ब्रिटिश हुकूमत के कड़े रुख के आगे इंदौर रियासत को झुकना पड़ा। पुलिस ने महाराजा के बेहद करीबी मिलिट्री अफसरों और बॉडीगार्ड्स को गिरफ्तार कर लिया, जिनमें आनंदराव फड़के और शफी अहमद जैसे बड़े नाम शामिल थे।
यह मुकदमा बॉम्बे हाई कोर्ट में चला, जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। कोर्ट रूम में मुमताज बेगम ने खुद गवाही दी और महाराज के जुल्मों की दास्तां बयां की। पुख्ता सबूतों और ब्रिटिश फौजियों की चश्मदीद गवाही के आधार पर अदालत ने तीन मुख्य आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई और बाकी को काले पानी (उम्रकैद) की सजा देकर अंडमान भेज दिया।
महाराजा को अंत: छोड़नी पड़ी इंदौर की गद्दी
हालांकि, कानूनी तौर पर महाराजा पर सीधे अदालत में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता था, लेकिन ब्रिटिश वाइसरॉय लॉर्ड रीडिंग ने उन पर शिकंजा कस दिया। महाराज के सामने दो ही रास्ते छोड़े गए—या तो वे इस मर्डर केस की निष्पक्ष जांच के लिए गठित ब्रिटिश ट्रिब्यूनल का सामना करें, या फिर अपनी गद्दी का त्याग कर दें।
अपने शाही सम्मान को बचाने के लिए, महाराजा ने साल 1926 में इंदौर की गद्दी छोड़ दी (Abdication)। उन्होंने अपने नाबालिग बेटे को इंदौर का नया महाराजा घोषित किया और खुद हमेशा के लिए फ्रांस (पेरिस) चले गए।
मुमताज बेगम का क्या हुआ?
इस खूनी खेल की केंद्र रहीं मुमताज बेगम को कोर्ट से सुरक्षा मिली। बावला की मौत के बाद उनकी अकूत संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा मुमताज को मिला, जिससे उनकी आर्थिक सुरक्षा तय हुई। वह बाद में मुंबई छोड़कर विदेश चली गईं और गुमनामी की जिंदगी जीने लगीं। इस तरह इंदौर के लाल बाग पैलेस से शुरू हुई एक जिद ने बॉम्बे की सड़कों पर खून बहाया और अंततः एक शक्तिशाली साम्राज्य के महाराजा का तख्तापलट कर दिया।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारी ऐतिहासिक पुस्तकों के संदर्भों और इतिहासकारों के आलेखों पर आधारित है, जिसे ‘NTV TIME CRIMEX’ सीरीज के तहत केवल सूचनात्मक और शैक्षणिक उद्देश्य से साझा किया गया है। इसमें व्यक्त किए गए तथ्यों, दावों और विचारों का NTV TIME समर्थन नहीं करता है, न ही इसके पूर्णतः अकाट्य या सटीक होने का दावा करता है।


