Friday, October 23, 2026

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इंदौर की सड़कों पर ‘अदृश्य’ हुए नियम; कैमरों की कागजी फौज पर हाईकोर्ट ने खड़े किए गंभीर सवाल

इंदौर की सड़कों पर ‘अदृश्य’ हुए नियम; कैमरों की कागजी फौज पर हाईकोर्ट ने खड़े किए गंभीर सवाल


स्मार्ट सिटी और स्वच्छता का दम भरने वाले इंदौर शहर की कानून-व्यवस्था को लेकर माननीय मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने आज प्रशासनिक दावों की कलई खोल कर रख दी है। शहर में लगातार बढ़ते बेलगाम ट्रैफिक और वीआईपी संस्कृति पर दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप भट्ट और न्यायमूर्ति गजेंद्र सिंह की डिवीजन बेंच ने जिम्मेदार अधिकारियों को आड़े हाथों लिया।

कोर्ट रूम में सरकारी वकीलों और जमीनी हकीकत के बीच का विरोधाभास आज साफ दिखाई दिया। दस्तावेजों में यह दावा पेश किया गया था कि पूरे शहर की निगरानी के लिए 660 सर्विलांस सीसीटीवी (CCTV) कैमरे पूरी तरह एक्टिव हैं और प्रत्येक मुख्य चौराहे पर ट्रैफिक के जवानों को मुस्तैद रखा गया है。

इस कागजी दावे को सिरे से खारिज करते हुए माननीय बेंच ने एक तीखा और मौजूं सवाल पूछा:

“सवाल यह नहीं है कि आपके पास 660 कैमरे हैं या 1000; सवाल यह है कि इस भारी-भरकम इंतजाम का अंतिम नतीजा क्या निकल रहा है? जब सुरक्षा अमला और कैमरे ऑन-ड्यूटी हैं, तो सड़कों पर नियम टूटते हुए क्यों दिखाई दे रहे हैं?”

न्याय के मंदिर के ठीक बाहर उड़ रही हैं धज्जियां

हाईकोर्ट ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि नियमों की यह अनदेखी किसी दूरदराज के इलाके में नहीं, बल्कि खुद हाईकोर्ट परिसर के ठीक सामने हो रही है। खंडपीठ ने अपनी टिप्पणी में रेखांकित किया कि किस तरह वीआईपी रसूख और कानून का डर न रखने वाले लोग बिना नंबर प्लेट या फिर भ्रामक नंबर प्लेट लगाकर सरेआम गाड़ियां दौड़ा रहे हैं। इतना ही नहीं, निजी वाहनों पर अवैध रूप से हूटर और इमरजेंसी सायरन लगाकर घूमना एक आम बात बन चुका है, जिस पर कोई स्थाई अंकुश लगाने में यातायात पुलिस नाकाम सिद्ध हो रही है।

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चालान की रसीदें नहीं, सड़कों पर सुधार चाहिए

नाराजगी जताते हुए माननीय न्यायाधीशों ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि पूरी ट्रैफिक व्यवस्था सिर्फ ‘ड्रिंक एंड ड्राइव’ और कागजी चालान काटने तक ही सीमित रह गई है। अदालत ने साफ शब्दों में चेतावनी दी कि महज चालानों की संख्या बढ़ा देने से सड़कों पर रेंगता हुआ ट्रैफिक और रोज-रोज का जाम खत्म नहीं होगा। शहर को एक ‘सभ्य और सुरक्षित यातायात’ प्रणाली की जरूरत है, न कि केवल चालान थमाने वाले तंत्र की।

सुप्रीम कोर्ट के नियमों की अनदेखी पर 28 सितंबर को मांगा जवाब

मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने दिशा-निर्देशों का हवाला दिया, जिसमें रिहायशी और घने शहरी इलाकों में दिन के वक्त भारी व्यावसायिक वाहनों के प्रवेश को पूर्णतः प्रतिबंधित या नियंत्रित करने की बात कही गई है।

हाईकोर्ट ने इस विषय पर भी सरकार को अपनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। प्रशासन को यह निर्देशित किया गया है कि वे अगली सुनवाई में इस बात का पूरा खाका पेश करें कि भारी वाहनों की एंट्री को रोकने के लिए अब तक क्या कदम उठाए गए हैं। इस बड़े मुद्दे पर विस्तृत जवाब दाखिल करने के आदेश के साथ ही अदालत ने अगली सुनवाई 28 सितंबर से शुरू होने वाले सप्ताह के लिए तय कर दी है।

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